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Anand Aur Sukh – Dukh Mai Kya Antar Hai | Hindi


गुरुदेव! मन को वश में करने का सरल उपाय क्या है?

उत्तर:- मन को वश में करने का सरल उपाय है – उसकी दिशा में परिवर्तन करना । जो मन विकारों की ओर जा रहा है, उसे सद्विचारों की ओर मोड दे
।यह दिशा – परिवर्तन करना ही मन पर विजय पाना है । मन के कारन ही हम मनुष्य हैं । मन से ही चिंतन-मनन का भी सामर्थ उत्पन्य होता है । पदार्थो के प्रति आकृस्ट होने पर अच्छे-बुरे का लाभ-हानि का विवेक लुप्त हो जाता है । जो प्राप्त नहीं
हैं , उसे प्राप्त करने की और जो पहले से प्राप्त है उसका संरक्षण करने की लालसा प्रबल जो जाती हैं

अतः मन को वश में करने का प्रथम उपाय है- सत्संगति ।अर्थात जो सत्य है- उसके साथ रहो ।

गुरु जी ! सत का अर्थ क्या है?

उत्तर:- सत अर्थात श्रेष्ट , उत्तम व् अच्छा ।इसका अर्थ है की हम ऐसे वक्तिओ की संगति में रहे जो श्रेस्ठ है जिनका चरित्र , व्यवहार , आचरण श्रेस्ठ हैं ।

मन पर विजय पाने के लिए भारतीय पदार्थ क्या कहती है?

उत्तर:-मन पर विजय पाने के लिए भारतीय पदार्थ कहती है- स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ो ।
सबसे स्थूल जय हमारा आहार । सर्वप्रथम अपने आहार पर विजय प्राप्त करें। यदि उसे शुद्ध व् सार्विक बना लिया तो मन पर विजय पाने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ जायेंगे । जैसे खाये अन्न वैसा बने मन यह कहावत निरर्थक नहीं है । आहार से सूक्ष्म है- हमारी काया । आहार विजय के बाद शरीर को साधें उसे नियंत्रण में लें ।
विविध प्रकार के आसन- व्यायाम आदि का विधान काया को साधने के लिए ही है
। इससे शरीर की चंचलता काम होगी, जिसका सकारात्मक असर मन पर होगा ।काया से सूक्ष्म है- वाणी या वचन और उससे भी सुक्ष्म है- हमारा मन ।जिसने वाणी पर नियंत्रण केर लिया, उसका मन स्वतः ही वश में हो जायेगा । हमें मन द्धारा नियंत्रित नहीं होना है , बल्कि स्वयं के मन पर नियंत्रण रखने की आवश्यकता है ।ध्यान करने से तन और मन के सभी विकार स्वयं ही दूर हो जाते हैं । मन पर नियंत्रण के लिए ध्यान करना सबसे श्रेस्ठ विकल्पों में से एक है ।ध्यान करने से मन यहां -वहां भागना बंद कर देगा और इसे एक सही और निश्चित दिशा में एकाग्र करना काफी आसन हो जायेगा ।

गुरुदेव! मन को एकाग्र करना मुश्किल लगता है कैसे करें ?

उत्तर:- गीता में श्री भगवान ने कहा है कि लगातार अभ्यास से हम स्थित प्रज्ञ मन वाले बन सकते है
। दूसरे शब्दों में लक्ष्य के प्रति प्रतिवद्धता ही एकाग्रता है हमने जो लक्ष्य जीवन में निर्धारित किया, उसके लिए हम सब व् प्राणो से समर्पित हो और तब तक उसमे लगे रहे जब तक कि अभीष्ट कि प्राप्ति न हो जाए
। एकाग्रता के लिए मन पर नियंत्रण अति आवश्यक है ।

गुरुदेव! आनंद और सुख- दुःख में क्या अंतर है ?

उत्तर:- मनुष्य जब स्वयं के स्वरुप से परिचित होता है तब केवल आनंद ही आनंद है । आनंद कि अनुभूति बाहर से नहीं होती । आनंद को सुख नहीं समझना । आनंद और सुख में अंतर है । जहां सुख नहीं वहां सुख है । जब दुःख नहीं वहां सुख है । आनंद कि अवस्था सुख व् दुःख दोनों से परे है ।जहां दुःख और सुख दोनों का अभाव हो , चित्र कि परिपूर्ण शांत स्थिति आनंद को स्थिति है । जहाँ बाहर का कुछ भी हमे प्रभावित नहीं कर रहा ।
सुख एक संवेदना है दुःख भी एक संवेदना है
। सुख एक पीड़ा है , और दुःख भी एक पीड़ा है । सुख व दुःख दोनों बेचैन करते हैं ।दोनों में अशांति है । सुख प्रीतिकर और दुःख अप्रीतिकर लगता है । दोनों में उत्तेजित अवस्थाये हैं ।

गुरुदेव! क्या सुख दुःख में फँसे संसारी प्राणियों को भी आनंद मिल सकता है।

उत्तर:- हाँ। भगवान महावीर को बुद्ध को , क्राइस्ट कप जो आनंद मिला वह हम सब में भी विधमान है । आप में और उनमें आनंद की दृष्टि से भेद नहीं है । भेद केवल ज्ञान की दृष्टि से है । सुख दुख अनु भुतिया हैं जो बाहर से आई आनंद वह अनुभूति हैं जब बाहर से कुछ नहीं आता । आनंद अपना अनुभव है । सुख और दुःख छीने जा सकते है । जो आदमी सुखी था किसी कारण से था; कारण हार जाएगा तो दुखी हो जाएगा। जो आदमी दुखी था , किसी कारण से था; जब कारण हार जाएगा तब वह सुखी हो जाएगा। अतः आनंद निः कारण है। आनंद को छीना नहीं जा सकता। सुख छीना जा सकता है , दुख छीना जा सकता है लेकिन आनंद नहीं। जो बाहर पर निर्भर है वह छीना जा सकता है। इसलिए सुख- दुख क्षणिक है और आनंद स्थाई है , नित्य है । सुख- दुख दोनों परत्रंत है क्युकि दूसरे का उसमें हाथ है । जबकि आनंद स्वतंत्र है । सुख- दुःख दोनों बंधन है आनंद मुक्ति दायक है ।इसे संसार का प्रत्येक प्राणी प्राप्त कर सकता है।

गुरुजी! ध्यान किसे कहते है?

उत्तर:- ध्यान का अर्थ है- मन

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