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Bhaarat Ka Mukti Mantr Kya Hai – Hindi


गुरुदेव ! सपने का सुख कब तक होता है ? क्या सपने आना अच्छी बात है ?

उत्तर:- सपनों का सुख क्षणिक होता है । स्वपन का सुख-दुःख सपने तक ही सीमित होता हैं । जहाँ आँखे खुली, सपने का सारा अनुभव समाप्त हो जाता हैं । स्वपन चित्र का विकार हैं । ब्रह्मवेदाओं को स्वपन नहीं आते । स्वपन में बहु प्रकार की संवेदनाएं बिम्ब बनते हैं । स्वपन में कई बार व्यक्ति पतन को देखकर लज्जित होता है । यदि अच्छा स्वपन आए तो आनंदित हो उठता हैं । जब किसी वस्तु, पदार्थ व्यक्ति के प्रति गहरा राग होता है , आसक्ति होती है तभी स्वपन आते हैं क्योंकि मन जिसका निरंतर कामना करता रहता है वही तो सपनों में आएगा । हाँ अगर सपने ठीक न आएं तो यह मन की अधम अवस्था है । सच्चा साधक वही है जिसका एकांत पवित्र है । जिसे सपने की अवस्था में भी विकार न दिखाई दे । सपने भी पवित्र हों । कभी-कभी सपने में वह भी उजागर होता है जो घटित होना होता हैं ।

सांसारिक दुखों से छुटकारा कैसे मिले ?

उत्तर:- देखिए ! कुछ लोग पदार्थों के सुख में जीते हैं कुछ लोग अपने होने के आनंद में रहते हैं । आज व्यक्ति को अपने निकट रहने की आदत नहीं । मन अनुकूलता के संशय में जूता रहता है । जहाँ से सुख का आमंत्रण मिलता है , हम उसी का संचय करने में जुटे रहते हैं । उसे ही पाना चाहते हैं । उन्हीं पदार्थों से राग हो जाता हैं । जिस पदार्थ से दुःख मिले उससे द्धेष हो जाएगा । जो सुखकर लगता है , हम सारा श्रम वहीँ लगा देते है । फिर दुखों से छुटकारा कैसे मिले ?
सुख और प्रसन्नता तो ज्ञान सापेक्ष है, चिंतन सापेक्ष है । स्थाई प्रसन्नता वैराग्य से आएगी । इसलिए भीतर के ज्ञान चक्षु खोलिए, तभी सांसारिक दुखों से छुटकारा मिलेगा ।

श्रवण अमोल साधन है कैसे ?और हमें किन्हें सुनना चाहिए?

उत्तर:- एक साधक के लिए पूजा अर्चना बड़े साधक हैं फिर भी श्रवण सबसे श्रेयस्कर है । यदि व्यक्ति की ऐसी धरना बना जाए की जो सुन रहें हैं वह मोक्षदयाक , कल्याणकारक , सिद्धिकारक है तो श्रवण ही अमोल साधक बन जाता है । श्रवण के बाद भीतर एक बिम्ब बनता है, एक आकर बनता है जिससे सही निर्णय हो जाता है । जैसे अर्जुन ने गीता सुनकर निर्णय लिया और कहा हे माधव ! तुम्हें सुनकर मैं निर्भर , आनंदित हो गया हूँ । इसलिए महापुरुषों को सुनें । माता-पिता को सुने और साथ ही सभी आदरणीयजनों की सुनें । यदि सुनने की मेहजाजगाएँगे तो स्पेस डेवलप होगा । आज हर कोई सुनाना चाहता है, सुनने को कोई त्यार ही नहीं । हाँ आपको कोई सुनाए तो सुनिए । इससे उसकी व्याकुलता, व्यग्रता , चिंता , आवेश, अवसाद सबकुछ बाहर आ जाएगा । सिर्फ घरों व भावनाओं का इंटीरियर कटाने से काम नहीं चलेगा , अपने भीतर की नैतिकता रूपी इंटीरियर को भी संभालें ।

गुरुदेव ! भारत का मुक्ति मन्त्र क्या है ?

उत्तर:- मर्यादा , शील – संयम और भारत का मुक्ति मन्त्र ‘राम’ है । सनातन आर्य वैदिक हिन्दू-धर्म संस्कृति का मेरुदंड और भारत की मृत्यूजयी सनातन संस्कार सत्ता की चेतना हैं – राम के नाम को जपने का जो फलादेश है , वही ॐ को जपने का है । ‘रा’ कहते ही मुँह खुलेगा और ‘म ‘ कहते ही बंद हो जाएगा । ऐसा ही ॐ के उच्चारण में होगा । राम तरफ मंत्र हैं । जिसकी जीभहाके अग्रभाग ओर यह मंत्र मचलता रहता है उसे हर पल परमानन्द की आनंद की अनुभूति होती है । अतः राम राष्ट्र का चरित्र हैं जिनके स्मरण मात्र से ही मुक्ति जीवंत हो जाती है । आनंद ko जिससे प्राण मिलते हैं , प्रसन्नता जिनसे स्थिर रहती है , जो सम्पूर्ण लोक को विश्राम देने वाले हैं- वह राम हैं । जो आरम्भ, मध्य, अंत प्रत्येक अवस्था में हैं – वह मुक्ति मंत्र राम है ।

व्यक्ति अभिमानी कब बन जाता है और इस अभिमान से हमें कौन बचाए?

उत्तर:- ईश्वर ने किसी प्राणी को अभिमानी नहीं बनाया जब व्यक्ति स्वयं को अपने से भिन्न मानने लगता है तभी वह अभिमानी बन जाता है । मई नहीं होना एक सिद्धि है । मैं में धर्म, जाती, सम्प्रदाय. पुरुष, स्त्री भी नहीं है और इस मैं से बचने का ज्ञान गुरु ही दे सकते है । गुरु ही बता सकते है कि उस अभिमान से कैसे बचा जाए जो हमारा सर्वनाश करदेता है ।

ज्ञान व बचपने का क्या संबंध है ?

उत्तर:- ज्ञान व बचपने का संबंध कुछ ऐसा है जैसे भुने व कच्चे चने एक अंतर होता है। भुने हुए चने में अंकुरण की संभावना नहीं होता । वहीँ कच्चे चने का अंकुरित होने का पूरा अवसर मिलता है । बचपन को अच्छे संस्कार देंगे तो वो अच्छे नागरिक बनेंगे । देश धर्म , समाज और इंसान से प्रेम करना सिखएंगे तो उनका भविष्य उज्जवल होगा ।

भारतीय संस्कृति में बहुत से मंत्र हैं परन्तु ‘राम’ के नाम को महामंत्र क्यों कहा जाता है ?

उत्तर:- क्योकि राम सनातन सत्य मंत्र है । आश्चर्य में भी , कौतुहल में किसी दृष्ट पुरुष की अधमता को देखकर , किसी अत्यंत निकृष्ट कृत्य को देख कर भी हमारे मुख से निकलता क्या है—? यही राम-राम-राम ही तो निकलता है विभिन्न भावों के साथ ..। प्रसब की पीड़ा के समय भी यही नाम प्रसूता के मुख से निकलता है और अर्थी के साथ शवयात्रा में भी यही नाम जाता है – ‘राम नाम सत्य है, सत्य बोलो गत्य (गति )हैं । मज़दूर जब माथे का पसीना पोछते हुए , सुस्ताने बैठता है तो उसके मुख से भी यही शब्द निकलता है – ‘ हे राम ! ….। ‘ राम भारतीय संस्कृति में इतने रच-पांच गए है कि अमोद-प्रमोद , हास्य-व्यंग हर अवस्था में हमारे साथ रहते है , तभी तो मुँह से निकलता हैं ‘ राम-राम ‘। किसी दैत्य-साधु, यदि, योगी, अति वृद्ध रोगी को देखकर भी सहसा हमारे मुँह से निकलता है- राम-राम पैरों में सरकंडा चुभे तो राम याद आता है । भगवन शिव कहते हैं कि हे पार्वती ! जीव , जगत और जगन्नाथ का यही भेंद है । सृष्टि का अंतिम ज्ञान जान लोगी तो फिर से देह को भस्म नहीं करना पड़ेगा और वह महामंत्र, गुरु मंत्र है –‘राम ।’ जब वार माता पार्वती ने शिव से सृष्टि का भेद क्या है ‘ कारण पूछा तब शिवजी ने पार्वती जी से यही कहा था ।

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