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Bhaav Aur Vyavastha – Short Story (Part-7)


भाव और व्यवस्था

कभी-कभी व्यवस्था भाव को समझ नहीं पाती।
समीक्षा को सौभाग्यवश हरिद्वार में हरिहर आश्रम के गेट पर चरण पादुका सेवा मिल गई । हजारों भक्त रुद्राक्ष पेड़ की परिक्रमा, पारद शिवलिंग व गुरुदेव के दर्शन हेतु आ जा रहे थे।
उसी समय एक पति-पत्नी का जोड़ा, जोड़े रखने हेतु पास आया । पति ने अपने जो़डे उतार कर पादुका घर में रख दिए ।
पत्नी ने अपनी चप्पल उतारी फिर पति की उठाई और उसके नीचे अपनी चप्पल छिपा दी।
ऐसा करते हुए जैसे ही समीक्षा ने देखा तो हंसते हुए कहा, “आप तो बड़ी चुस्त हैं, अपनी चप्पल छिपा कर रख दी कि गुम न हो जाए और पतिदेव का जोड़ा ऊपर रख दिया …।”
वह कहने लगी, ” नहीं – नहीं बाई जी!
इनकी चप्पल के ऊपर अपनी चप्पल कैसे राखूँ.. ? ”

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सॉरी

जैसे ही मैंने प्रतिभा को फोन किया तो दो मिनट बात करने के पश्चात् ही कहने लगी, ” अच्छा! जल्दी में हूँ , मुझे हस्पताल जाना है । डाक्टर से समय लिया हुआ है । रख रही हूँ… बाद में बात करूँगी । ”
“अरे ! हस्पताल जा रही हो, मुझे भी जाना है । तेरे साथ तो चली जाऊँगी, नहीं तो मुझे दिखाने के लिए किसी के पास भी समय नहीं।
“मैं भी चलूँ तुम्हारे साथ ?”
” अरे ! हाँ – हाँ , क्यूं नहीं… यह भी कोई पूछने की बात है । बस ! गाड़ी निकाल रही हूँ , दस मिनट में तुम्हारे पास पहुँच जाऊंगी ।”
प्रतिभा समय का इतना ध्यान रखती है कि सही दस मिनट बाद हार्न सुनाई दिया।
“आ रही हूँ… बस दो मिनट… । ”
(कितनी जल्दी – जल्दी की… फिर भी मुझे बाहर आने में दो की जगह दस मिनट लग गए । प्रतिभा का क्रोध भरा चेहरा गाड़ी में बैठते हुए मुझे साफ़ नज़र आ रहा था।)
खैर! जैसे ही हस्पताल पहुंचे तो रिसेप्शनिस्ट ने बताया कि आप पंद्रह मिनट लेट हो.. आपका नंबर कट चुका है ।
“प्लीज ! मैडम… यदि..? ”
” सॉरी! आप कल आइए। हां ! लेट नहीं चलेगा… निर्धारित समय से दो मिनट पहले पहुँच जाना ।”
“जी.. ।”
” प्रतिभा ! सॉरी …मेरे कारण… ।”
“क्या मेरे कारण… समय पर तैयार नहीं हो सकती थी…? ”
“हां ! ठीक कह रही हो तुम.. ।”
( पर सही शब्दों में उसकी डांट खाना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था ।)
हस्पताल से बाहर निकल कर वह मार्केट में कोई अन्य काम करने चली गई और मैं भी डाक्टर को बिना दिखाए ही वापिस आ गई। गुस्सा मुझे भी आ रहा था… क्या उसका हस्पताल में इस प्रकार मुझे डांटना उचित था..? जब क्रोध थोड़ा शांत हुआ तो धीरे से मन कहने लगा , ” हाँ – हाँ – हाँ.. ।”
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मेरा क्रोध

मैं पढ़ने लिखने का काम कर रही थी । पतिदेव दूसरे कमरे में टीवी देख रहे थे । उनकी आवाज़ मेरे काम में खलल डाल रही थी ।
” अरे भई! टीवी की आवाज़ कम कर दो … ।” मैंने कहा ।
उन्हें सुनाई नहीं दिया । थोड़ी देर बाद मैं फिर से चिल्लाई, “सुनाई नहीं दे रहा क्या… आवाज़ कम कर दो ।”
फिर भी कम न हुई तो मैं क्रोध में उठी और उनके कमरे में पहुँच गई। इससे पहले कि मैं कुछ बोलती, जा कर देखा- टीवी चल रहा है और महाशय नींद में जोर-जोर से खर्राटे मार रहे हैं…।
” हूँअअ…।”
मैंने पैर पटकते हुए टीवी बंद किया और अपने गाल पर जोर से दो तमाचे मारे.. ।

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उत्थान

जितनी बातें होती हैं महिला उत्थान की उससे भी कहीं अधिक प्रकाशित होती हैं पतन की।
मैंने देखा- होली के पावन पर्व का वह दिन। जब बारह मोटर साइकिलों पर बैठे युवा लड़के गली-कूचों में हुड़दंग मचा रहे थे। किसी पुलिस वाले की हिम्मत नहीं थी कि वह उन्हें रोक सके ।
ऐसे में होली खेलना तो दूर की बात किसी लड़की की इतनी भी हिम्मत नहीं थी कि वह बेधड़क पास के बाजार तक जा सके।
मेरे देखते-देखते एक लड़की जो एक्टिवा पर जा रही थी, उन युवाओं में से एक ने… उसके ऊपर पूरे ज़ोर से अंडा दे मारा ..। देखती ही रह गई मैं ।
बस में सफर करो तो जिन सीटों पर “महिलाओं के लिए ” लिखा होता है उन पर भी पुरुष अपनी धाक जमा लेते हैं । क्या यही उत्थान है ? कहाँ सुरक्षित है नारी ?
अब भी भरी दोपहरी में गेट पर खडी मैं देख रही हूँ उस लड़की को, जो ड्यूटी के बाद.. सहमी सहमी सी… तेज़ चाल से ..घर जा रही है…।

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