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Bhagavaan Ka Mahatv Kya Hain in Hindi


नारी अर्थात माँ की महिमा को शब्दों में वर्णन कैसे करें ?

उत्तर:- देखिए ! नारी इस सृष्टि और प्रकृति की जननी है । नारी के बिना तो सृष्टि की कल्पना भी नहीं की जा सकती । जीवन के सकल भ्रम , भय , अज्ञान और अल्पता का भंजन एवं अंतःकरण के चिर-स्थाई समाधान करने में समर्थ नारी हैं ।
माँ यह वो अलौकिक शब्द है , जिसके स्मरण मात्र से ही रोम-रोम पुलकित हो उठता है , हृदय में भावनाओं का अनहद ज्वार स्वतः उमड़ पड़ता है- और मनोमष्तिष्क स्मिर्तियों के अयाह समुंद्र में दुब जाता है । माँ को अमोघ मंत्र है , जिसके उच्चारण मात्र से ही हर पीड़ा का नाश हो जाता है । माँ हमारे वेद , पुराण, दर्शनशास्त्र , स्मिर्तियाँ , महाकाल , उपनिष्द आदि सव माँ की अपार महिमा के गुणगान से बहरे पड़े हैं । असंख्य ऋषि मुनियों , तपस्वियों , पंडितों, महात्माओं , विद्धानों, दर्शनशास्त्रियों , साहित्यकारों और कलमकारों ने भी माँ के प्रति पैदा होने वाली अनुभूतियों को महमूद करने का भरसक प्रयास किया है । इन सबके बाद भी ‘ माँ’ शब्द की समग्र परिभाषा और उसकी अनंत महिमा को आज तक कोई भी शब्दों में पिरो नहीं पाया है । माँ जी ममता और उसके आँचल की महिमा को वर्णन नहीं किया जा सकता सिर्फ अनुभव किया जा सकता हैं ।

नाम जप करते समय किस बात पर ध्यान देना आवश्यक है?

उत्तर:- कलयुग हेतु सरल व सर्वोतम उपासना है- नाम जप । नाम में महान शक्ति है, पर नाम जप करते हुए अर्थ पर ध्यान देना अति आवश्यक हैं । यदि नाम के अर्थ का ज्ञान है तभी वास्तविकता समझ आती हैं । नाम का मंत्रोच्चारण करते हुए ऐसा अनुभव करें कि ईश्वर हमारे हृदय पटल पर आसीन हैं । और उनकी पवित्रता हमारे चित्र कि ओर प्रवाहित होती जा रही है । यह भावना भी हमारे हृदय में अवतरित हो जानी चाहिए कि मन्त्र हमारे अंतः करण को स्वच्छ करता जा रहा हैं ।

क्या मनुष्य ईश्वर के नाम का जप करते हुए संसार सागर से तर नहीं सकता?

उत्तर:- संसार में ईश्वर कि नाम की बहुत महिमा है । भगवान के नाम का जप करने से संसार सागर में मुक्ति का मार्ग मिलता हैं । भगवान के नाम का जप जड़ को चेतन बना देता है । रामायण में नल-नील ने पत्थरों पर राम-नाम लिखा और उन्हें समुंद्र में छोड़ दिया वे पत्थर समुन्द्र में तैरने लगे । क्या मनुष्य ईश्वर के नाम का जप करते हुए तर नहीं सकता । अवश्य ही तर सकता हैं । निरंतर संभव एक ही उपासना है और वह है- नाम जप ।

नवरात्री किसे कहते हैं ?

उत्तर:- आदिकाल से ही मनुष्य की प्रकृति शक्ति साधना की रही है । शक्ति साधना का प्रथम रूप दुर्गा ही मानी जाती है । मनुष्य तो क्या देवी-देवता, यक्ष , किन्नर भी अपने संकट निवारण के लिए, माँ दुर्गा को ही पुकारते हैं । नवरात्री अर्थात देवी की नवधा शक्ति … जिस समय एक महाशक्ति का रूप धारण करती है, उसे ही नवरात्री कहते हैं । नवरात्री नव निर्माण के लिए होती है चाहे वह आध्यात्मिक हो या भौतिक । नवरात्री माँ के अलग-अलग रूपों को निहारने का सुन्दर त्यौहार है । हर एक व्यक्ति पुरे वर्ष भर जो भी कार्य करते-करते थक जाते हैं तो इससे मुक्त होने के लिए इन नौ दिनों में शरीर की शुद्धि , मन की शुद्धि और बुद्धि में शुद्धि आ जाए, सत्व शुद्धि हो जाए इस तरह के शुद्धि करण करने का व पवित्र होने का त्यौहार हैं – नवरात्रि । मन जाता है कि नवरात्र में किए गए प्रयास , शुभ संकल्प बल के सहारे देवी दुर्गा की कृपा से सफल होते हैं ।

हिन्दू नववर्ष कब और क्यों अन्य जाता है और इसकी विशेषता क्या हैं ?

उत्तर:- हिन्दू नववर्ष चैत्र मॉस के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाया जाता है , जिसे ‘विक्रम संवत्सर ‘ भी कहते हैं । विक्रम सवंत्सर अत्यंत प्राचीन संवत है । भारत के सांस्कृतिक इतिहास की दृष्टि से सर्वाधिक लोकप्रिय राष्ट्रीय संवत ‘विक्रम संवत्सर’ ही है । पुराणों के अनुसार चैत्र मॉस के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया था , इसलिए इस पवन तिथि को ‘नव संवत्सर ‘ पर्व के रूप में भी मनाया जाता है । शास्त्रीय मान्यता अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि को प्रातः काल स्नान आदि से शुद्ध होकर हाथ में गंध अक्षत , पुष्प और जल ले कर विधित्व नव सवत्सर की पूजा करनी चाहिए । ऐसा मन जाता है कि चन्द्रगुप्त क्रियादित्य ने देश के सम्पूर्ण चरण का , चाहे वह जिस व्यक्ति का भी रहा हो , स्वयं चूका कर विक्रम सवत्सर ‘ की शुरुआत की थी । ये भी मान्यता है कि सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमदिव्य ने देशवासियों को शकों के अत्याचारी शासन से मुक्त किया था । उसी विजय की स्मृति में चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से विक्रम सवत्सर का आरम्भ हुआ था । अतः चैत्र शुक्ल प्रतिपदा एक स्वयं सिद्ध अमृत तिथि हैं । इस दिन यदि शुद्ध चित्र से किसी भी कार्य की शुरुआत की जाए एवं संकल्प किया जाए तो वह अवश्य सिद्ध होता हैं ।

भगवान् का महत्व क्या हैं?

उत्तर:- भगवान् संकीर्तन एवं सर्वांटियामि परमात्मा के प्रति अनन्य भाव-भक्ति व समपर्ण से मनुष्य आधिभौतिक -आधिदैविक एवं आध्यात्मिक आदि त्रिविध तापों से मुक्त होकर ब्रह्मांड की स्वाभाविक अनुभूति को प्राप्त कर लेता हैं।

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