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Bss Itna Hi – Short Story in Hindi (Part-3)


बस इतना ही

आंटी! भैया कब आएंगे? पड़ोस के बेटे ने पूछा। संदीपा ने कहा, क्या काम है सब और कुशल तो है? हां आंटी! मम्मी को दिखाना था। अरे! तुम्हारी मम्मी तो बिल्कुल ठीक लगती है कल ही तो मिली हूँ।
हाँ आंटी! पर आजकल मुझसे और बड़े भाई से लड़ती रहती है। और तो और पापा जी को उल्टे-उल्टे जवाब देती है। भाभी का जीना मुश्किल कर रखा है। मुझे लगता है उन्हें कोई दिमागी बीमारी है। भैया डाक्टर हैं, कोई अच्छी सी दवाई लिख देंगे।
क्या पहले भी कभी ऐसा लगता था? नहीं आंटी! भैया की शादी के बाद ही ऐसा करने लगी है।
बेटे! एक बात कहूँ… तेरी मां को कुछ नहीं हुआ। आंटी! कोई पैसे की कमी नहीं, खाने-पीने की कमी नहीं फिर भी…। तुम ठीक कहते हो बेटा! उसे सम्मान चाहिए। तुम डाक्टर के इलाज से पहले बस इतना करो, उसके पास बैठो- उसका कहना मानो। अगर वो दो शब्द गलत कह भी दे तो उसे सहन कर लेना। तुम रो लेना पर उसे उल्टा जवाब मत देना…। मां है पिघल जाएगी। ठीक है आंटी! इसमें कौन सी मुश्किल है। उसे बच्चे चाहिए- बड़े नहीं। वो देना-देना जानती है। बच्चों की डांट-फटकार का दुःख उससे सहन नहीं होता। जब उल्टा होने लगता है तो पागल नज़र आती है।
कुछ दिनों बाद फिर मैंने पूछा, अरे मनजीत! तुम्हारी मम्मी कैसी है?
आंटी! आपकी बात जादू कर गई। मम्मी बिल्कुल ठीक है सच में- उसी चीज़ की कमी थी… हुण घर विच्च बिल्कुल भी क्लेश नहीं हुंदा- मैं सब संभाल लैंदा हां…।
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स्वयं को देखे

उस दिन मैं मीटिंग में नहीं जा पाई। वहां क्या-क्या हुआ उसकी जानकारी मुझे फोन करके किसी ने नहीं बताई। मैंने ऊषा जी से कहा कि यह कौन सा तरीका है कम से कम हमें बताना तो चाहिए कि मीटिंग में क्या-क्या निर्णय लिया गया है, आखिर मैं संस्था की महासचिव हूँ।
मेरी बात सुनते ही वह बोली, एक तो आप वहां आई नहीं दूसरा हमें दोषी ठहरा रही हैं। यह कौन सा तरीका है? यदि पद लिया है तो उसकी जिम्मेदारी निभाना भी तो आपका कर्तव्य बनता है। फिर छोटी-छोटी बातें तो चलती रहती हैं इसका अर्थ यह तो नहीं कि आप पीछे हट जाएं। थोड़ा सा झुकना सीखें। जहाँ मिलझुल कर काम करते हैं, वहां झट से क्षमा मांगने में क्या जाता है… दूसरों को शांत ही तो करना होता है।
इसी बात को लेकर हमारी आधा घण्टा बहस होती रही। आखिर जब उसने क्षमा मांगी तब मैं अपने घर वापिस आई।
घर आकर मंथन किया तो मुझे उसकी हर बात सही लग रही थी। गलती सारी मेरी थी। मैंने तुरंत उसको फोन मिलाया और क्षमा याचना करते हुए कहा, आगे से मैं कोई गलती नहीं करूँगी। हम मिलकर काम करेंगे।
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अनुभव

नव्या और जैनी दादी के साथ सोई थी। वे दोनों रात भर इधर-उधर हिलती रही, इसी कारण दादी को नींद नहीं आई। वह उनको बार-बार रज़ाई से ढकती रही।
उसने सोचा, मैं औरों को समझाती हूँ… अगर नींद न आए तो राम-राम की माला जपो तो तुरंत नींद आएगी, आती-जाती साँस को देखो– तुरंत नींद आएगी… आदि-आदि। लेकिन आज सारे उपाय मुझ स्वयं पर लागू नहीं हुए। रोज़ तो हो जाते हैं… पर आज नहीं। रात के तीन बज गए नींद का नामो निशान नहीं। शायद जिन लोगों को नींद नहीं आती उनके साथ ऐसा ही होता होगा। वे भूत-भविष्य में उलझे रहते होंगे। कभी गर्मी है तो कभी सर्दी है- कभी बाथरूम जाना है। यही तो होता है जब नींद नहीं आती। आज जब प्रत्यक्ष अनुभव में आया, तब जाना लोगों की परेशानी का कारण। जब सास-माँ कहती थी, मुझे नींद नहीं आती तब मैं बहुत से उपदेश देने लगती। आज मुझे उनके कहे शब्द याद आ रहे हैं- “कोई बात नहीं, धीरज रख बेटी! सब कुछ पता लगेगा। अभी तक तो हरी-हरी चुगी है, सब समझ आ जाएगा।”
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बच्चे के मुख से

दादी पूजा कर रही थी और पाँच वर्षीय निशू इधर-उधर घूमती हुई सैंडविच खा रही थी। एक पल के लिए वह दादी के पास रूकी और बोलने लगी, “तुम नीले-पीले-हरे, तुम गोरे क्यों नहीं होते। तुम इतने नीले जो हो तुम लगते कि जैसे कोई और ही हो।”
दादी ने सुना तो हैरान रह गई। तुरंत ही डायरी पेन उठा कर यह पंक्तियाँ नोट कर दी। फिर निशू से पूछा, तुम किस के लिए ऐसे बोल रही थी?
तो हंसते हुए वह कहने लगी, ‘कृष्णा।’
हैरान थी यह नन्हीं सी बच्ची क्या बोल रही है। फिर ध्यान आया, किसी ने सच ही तो कहा है- ‘पूत के पैर पालने में ही पहचाने जाते हैं।’ दादी ने फिर उससे पूछा निशू! तुम बड़ी होकर क्या बनोगी?
वह बोली, दादी! मैं आपकी तरह कविताओं की किताब लिखूँगी…।
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धिक्कार है मुझे

वह जैसे ही शाम को दफ्तर से घर वापिस आया तो आईना देखते-देखते स्वयं से बातें करने लगा- यार! यह व्हाट्सएप की क्या चीज़ बनाई है… तकनीक कहां की कहां पहुंच गई। देखो! मैं यहां अमेरिका में बैठा हूँ और दोस्त, परिवार सभी गाँव में रहते हैं।

रोज़ मैसेज आते हैं, फेसबुस पर भी देखता हूं। लगता है- मैं दूर नहीं हूँ। फिर भी कभी-कभी न जाने मुझे क्या हो जाता है। मेरी माँ, मेरी गुड़िया सी बहन और पापा… उनकी यादें तड़पाने लगती हैं। ऐसा लगता है मेरा वह बचपन का दोस्त शंटू… जिसके साथ मैं गली में कंचे, छुपन-छुपाई खेलता था और कबड्डी भी… वह मुझे कभी नहीं मिलेगा। उसकी दोस्ती के बिना मैं अधूरा हूँ। फिर सोचता हूँ- मैं यहां आया किस लिए हूँ.. पैसे के लिए….। हां-हां पैसे के लिए। मैंने सभी अपने क्यों छोड़े हैं?… सिर्फ पैसे के लिए। सचमुच ऐसा ही है। यदि ऐसा है तो धिक्कार है मुझे। बीमार बूढ़े माँ-बाप को गाँव में छोड़कर मैं स्थाई रूप में यहां बसना चाहता हूं। मेरे अपने देश में क्या रोज़गार और पैसे की कमी है…? यदि कमी हो भी तो… तो क्या किसी को ऐसे खून के रिश्तों को छोड़ देना चाहिए। नहीं न….? क्या पैसों से कभी अपनों का प्यार खरीदा जा सकता है? क्या मैसेज और वीडियो कॉल- मेरे माँ-बाप को हस्पताल ले जाएंगे- क्या वह बाजार की जरूरत पूरी कर उनकी छाती को ठंडक पहुँचा पाएंगे? ….नहीं न?

बस लगता है कि आज मेरा दिमाग सही हो गया है। मुझे वापिस अपने देश जाना है। यही सोचते हुए वह नेट पर वापिसी की टिकिट ढूँढने लगा।

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