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गणतंत्र दिवस किन जीवन मूल्यों पर आधारित है | Hindi


गणतंत्र दिवस किन जीवन मूल्यों पर आधारित है?

उत्तर:- गणतंत्र दिवस भारत का राष्ट्रीय पर्व है। बच्चा-बच्चा जानता है कि यह दिवस भारत के गणतंत्र बनने की खुशी में मनाया जाता है । 26 जनवरी 1950 के दिन भारत को एक गणतांत्रिक राष्ट्र घोषित किया गया था । इसी दिन स्वतंत्र भारत का नया संविधान अपनाकर नऐ युग का सूत्रपात किया गया था । यह भारतीय नागरिकों के लिए स्वाभिमान का दिन है। गणतंत्र दिवस अपनी उपलब्धियों के मूल्यांकन का दिन है । गणतंत्र भारत में कौन सी मंजिल तय कर ली और किन – किन मंजिलों को अभी छूना बाकी है,
इस दिन इसकी समीक्षा की जाती है । गणतंत्र दिवस पर राष्ट्र अपने महानुभावों को स्मरण करता है । हजारों लाखों लोगों की बलिदानी के बाद देश को आजादी मिली फिर राष्ट्र गणतंत्र बना । स्वतंत्रता हमें ऐसे ही नहीं मिली , इसके लिए कितने ही देशभक्तों ने अपनी जान गवाई। इन्होंने देशवासियों के सामने जीवन-मूल्य रखे। इन्ही जीवन मूल्यों पर आधारित है हमारा गणतंत्र दिवस।

क्या प्रेम जीवन में आनंद को पाया जा सकता है?

उत्तर:- नहीं प्रेम ही जीवन में आनंद की कल्पना करना मूर्खता है प्रेमवीर जीवन एक शुष्क
मरुस्थल के समान होता है। उसमें रस अथवा आनंद का एक कन भी नहीं मिल सकता भले ही जीवन में कितनी भी धन दौलत हो, सभी सुख-साधन क्यों ना हो। संसार में प्रेम से बड़ा कोई मंत्र नहीं।
प्रश्न:- संसार में सबसे बड़ा मंत्र कौन सा है? उत्तर:- संसार में प्रेम से बड़ा कोई मंत्र नहीं। प्रेम द्वारा शत्रु को भी वश में किया जा सकता है। प्रथम जो प्रेमी हृदय होते हैं, वे स्वभावत: अज्ञातशत्रु होते हैं। संसार में उनसे द्वेष करने वाला कोई नहीं होता और यदि अपने दुष्ट स्वभाव-वश कोई उनसे द्वेष मानने भी लगता है तो भी वह उनके सम्मुख आकर विनत हो जाता है। सच्चे संत और महात्माओं को न जाने कितने चोर, डाकू व दुष्ट लोग मिले उनको हानि पहुंचाही किंतु उनके पास जाते ही आंतरिक प्रेम से प्रभावित होकर उनके पैरों पर गिर गए और महात्माओं की प्रेमानुभूति से विवश होकर संत तक बन गए। जिन परिवारों, मित्रों और सुहृदजनों के बीच सच्चा प्रेम रहता हैं, उनके बीच क्या संपन्नता और क्या विपन्नता। किन्हीं भी स्थितियों में कलह, कलेश अथवा विवाद नहीं होता। उनका सारा जीवन प्रमानंद की शीतलता और सरलता से भरा रहता है। संसार को जीतने का मंत्र प्रेम ही है।

सफलता अर्जित करने के लिए संकल्प शक्ति का निर्माण कैसे होता है?

उत्तर:- देखिए किसी भी काम में सफलता अर्जित करने के हेतु दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है । इस संकल्प शक्ति का निर्माण आशीर्वाद ,प्राण और मन के मिलन से होता है। इन तीनों का उपयोग संकल्प को क्रिया में बदलता है। यह तीन बातें जीवन में असफलता लाती है- असहाय होना, स्वयं को असमर्थ मानना और अशक्त बन जाना। लेकिन संकल्प शक्ति से पार पाया जा सकता है। अपने भीतर संकल्प पैदा करने के लिए बड़ों के आशीर्वाद के अलावा प्राण की आवश्यकता होती है। इसका अर्थ योग से जीवन चर्चा को जोड़ें। प्राणायाम को प्रबंधन का महत्वपूर्ण आधार बनाएं । इसके बाद आता है मन। मन की रुकावटे अनेक शक्लें लेकर आएंगी। इसे निष्क्रिय किए बिना संकल्प सक्रिय नहीं हो पाएगा। प्राणायाम ही इसका इलाज है। अतः इन तीनों से ही संकल्प शक्ति का निर्माण होता है।

संकल्प क्या है ?

उत्तर:- अगर आप जिंदगी में कुछ करना चाहते हैं तो आपके पास पहला संकल्प जो है वह है अच्छी सोच। हर सुबह एक नया जीवन है। सुबह अच्छा पढ़ने से जीवन अच्छा होता है । और बुरा पढ़ने से, बुरा सुनने से और बुरा देखने से जीवन नकारात्मक हो जाता है। क्योंकि सुबह अच्छे विचारों के चिंतन से अच्छी उर्जा उत्पन्न होती है। जो पूरे दिन आपके चारों तरफ अच्छे आवरण का काम करती है।
अतः जो लोग जीवन में अच्छी सोच रखते हैं। जीवन को त्याग पूर्वक भोंकते हैं, प्रसाद पूर्वक भोगते हैं ; विचारपूर्वक भोगते हैं , वे सदा सुखी रहते हैं ।

बड़े लक्ष्य की पूर्ति हेतु सबसे ज्यादा कहां ध्यान देना आवश्यक है?

उत्तर:- अपने लक्ष्य की ओर किसी तीर की भांति पूरा ध्यान रखते हुए कल्पना शक्ति और दूरदर्शिता आवश्यक है परंतु बिना विवेक के ये भी घातक है । जब भी कोई कार्य का शुभारंभ विवेक से होगा तो उसमें शत-प्रतिशत सफलता मिलेगी । धरती पर केवल एक मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जिसके पास श्रेष्ठ से श्रेष्ठ और तुच्छ तुच्छ विचार दोनों एक समान होते हैं। अपने पास विचारों की चरम ऊंचाई है तो आचरण की निम्नतम गति भी है। उठेगा तो इतना ऊंचा उठ जाएगा कि देवत्व लाघले और गिरेगा तो इतना नीचे गिर जाएगा कि पशु भी शर्मिंदा हो जाए। भारत के पास श्रेष्ठतम शास्त्र शास्त्र रहे हैं, एक से बढ़कर एक महापुरुष आए इस धरती पर, अवतारो ने जीने की कला सिखा दी, फिर भी लोग चूकते गए । इसके पीछे एक बड़ा कारण यह रहा है कि हमने-विवेक शून्य होकर इनका उपयोग किया। जिस दिन हम विवेकहीन हो जाते हैं, हमारा आधार ही खिसक जाता है। हम धार्मिक भावनाओं में इतने बह गए कि सही गलत भूल गए। भावुकता उत्तेजना बन गई। अतः बड़े लक्ष्य की सफलता हेतु यथार्थ का धरातल विवेक मांगता है।

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