bedpage.com
Think Smart Think Digital!

Guru Ne Kaha – Short Story in Hindi (Part-8)


गुरू ने कहा

गुरू मां को प्रणाम करते ही उसके टप- टप आँसू बहने लगे ।
गुरू मां पहले तो मौन रही फिर पूछा -क्या हुआ ?
– बहू…..उससे परेशान हूँ ।
– तो रोने की क्या बात है ? झगड़ती है क्या ?
– नहीं.. ।
– काम नहीं करती ?
– नौकरी करती है ।
– बोलती नहीं ?
– मौन रहती है ।
– और तुम ?
– मैं भी मौन रहती हूँ ।
– वाह ! इससे अच्छा क्या होगा ?
दोनों मौन रहती हो । फिर समस्या कहाँ है ?
– संवाद नहीं होते…।
– हा – हा- हा …।( गुरू मां खिलखिलाकर हँसने लगी) रिश्तों की मिठास को बनाए रखने के लिए ज़्यादा संवाद ठीक नहीं होते । ‘स्व’ से दूर हो जाओगी तुम । ‘सकारात्मक सोचो….सकारात्मक ।’

________________

मेरा गाँव

बहुत याद आता है मेरा छोटा सा गाँव… ।
जहां एक दूसरे को देखते ही फूलों की भांति खिल उठते थे लोग.. ।
गले मिलते और दु:ख-सुख पूछते थे परिवारजनों का.. । कोई वस्तु अगर थोड़ी सी ज्यादा मात्रा में दिखाई देती तो पड़ोसियों में बांटकर खाते। तीज-त्योहारों पर बड़े बुजुर्गों की राय ली जाती । किसी को आंटी-अंकल नहीं कहा जाता था। बस… चाचा – चाची, ताया – ताई , दादा – दादी पुकारा जाता ।
जब से शहर आई हूँ तो देखती हूँ …सब अपने आप में मस्त हैं । किसी के घर में क्या हो रहा है किसी को कुछ लेना – देना नहीं । दु:ख- सुख कोई नहीं सांझा करता । पड़ोस में चाचा- ताया , कहना-सुनना तो दूर की बात है इतना भी नहीं पता कौन आंटी अंकल रहते हैं । बाहर झाँको तो लंबी-चौड़ी सूनी सी सड़कें दिखाई देती हैं या फिर हाए-बाए करते हाथ दिखते हैं और कुछ नहीं मेरे गांव के जैसा.. ।

______________

छुअन

वह मुस्करा कर मेरी ओर निहार रही थी । मैं भी मौन खड़ा उसकी ओर ताक रहा था । उसकी पावन नजरों में औरों जैसी कोई गंध नहीं थी ।
जब लगभग दो मिनट का समय बीत गया तो मेरे मुख से चंद शब्द फिसल कर उसके कानों तक पहुंच गए …” मैं तो तुम्हें छू भी नहीं सकता… ।”
– “मैं तो छू सकती हूँ…. ।” इतना कहते ही उसने अपना दायाँ हाथ मेरे शीश पर रख दिया…. और हंसते हुए कहा, “मंगल हो तुम्हारा।” फिर तो मैंने भी झट से झुककर धरा को छू लिया ।

________________

छि: छि:

हम अमुक संत जी के शिष्य हैं जी। आप लोगों से बात करके अच्छा लग रहा है। फिर वह प्रवीण जी से पूछने लगे, “आपके गुरू कौन हैं जी ?
इससे पहले कि वह उत्तर देते उन्होंने फिर से बोलना शुरू कर दिया , “जी! हमारे गुरूजी का स्टैण्डर्ड बहुत ऊंचा है …वहां एकदम बढिया खाना और ए.सी.कमरे हैं । ‘क’ संतों की तरह नहीं कि जमीन पर सुला दिया…हल्का खाना दे दिया । ना जी ना… आप आओ हमा…. ।”
वह भाई अभी बात कर ही रहा था कि प्रवीण जी ने क्षमा मांगते हुए कहा कि आप अपने गुरु की प्रशंसा कर रहे हैं यह बहुत अच्छी बात है परन्तु आप जो दूसरे की बुराई कर रहे हो भाई ! वह गलत बात है । जरा-सा सोच कर देखिए ..आप कह क्या रहे हैं ….यह तो वही बात हुई कि हम किसी को कहें कि हमारे घर आइए.. देखिए.. क्या आलीशान बंगला है… देखना कितना बढिया फर्नीचर है.. हम क्या-क्या बढिया माल खाते हैं… । पड़ोस के पवन की तरह नहीं कि घटिया सा मकान.. टूटी सी गाड़ी… आप हमारे आइए । छि: … छि: …।
खैर ! उसे तुरंत ही अपनी गलती समझ आ गई और उसने क्षमा मांग ली। वह सचमुच किसी महान गुरु का शिष्य था।

_________________

आशीर्वाद

सुबह सात बजे जैसे ही गाय को गुड़ देने के लिए बाहर निकली तो एक वृद्धा मेरे पास आकर पूछने लगी -” रूपी का घर कौन सा है ? मैं भूल गई ।”
– मैंने पूछा , ” नंबर कितना है ?”
– नहीं पता… सेक्टर 71 है न ?
– जी हां.. ।.
उसने फोन नंबर लगाया पर नहीं मिल रहा था । मैंने कहा- आप रुकिए … मैं अपने फोन से लगाकर देखती हूँ ।
मैं अंदर से मोबाइल ले आई । जैसे ही नंबर मिलाया तो उनका पता चल गया । फिर कहने लगी,
“मैं गांव से आई हूँ। सोचा- सवेरे-सवेरे तो वह मिल जाएगी फिर अपनी ड्यूटी पर चली जाती है। बुआ हूँ मैं उसकी।”
“जी।”
थोड़ा आगे जाकर मैंने उसे उनका घर समझा दिया। वह अनेक आशीर्वाद देती हुई पीछे मुड-मुड़ कर देख रही थी।
मेरा मन जो घर के भीतर किसी बात को लेकर उदास था उसके आशीर्वाद से प्रफुल्लित हो उठा। उस माँ ने उदासी, चिड़चिड़ापन छीन कर मेरी झोली खुशियों से भर दी।
_________________

Have any Question or Comment?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *