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Gurudev Akshar Ko Brahm Kyon Kahate Hain | Hindi


गुरुदेव! अक्षर को ब्रह्म क्यों कहते हैं

उत्तर:- क्योकि अक्षर समूह ही जीवन रचना का आधार है । अक्षर ही अभिवयक्ति है । अक्षर को ब्रह्म इसलिए भी कहा गया है क्योकि सभी प्राणियों में ब्रह्म-अंतर ब्रह्म ही अभिवयक्त हो रहा है । अभिव्यक्ति ही अध्ययन -अनुभव चरित्र और संस्कार का परिचय है व् गोस्वामी तुलसीदास ने मानस के आरम्भ में अक्षर-ब्रह्म की उपासना की है । अभिवयक्ति का अर्थ विचारो के प्रकाशन से है । वयक्तित्व के समायोजन के लिए मनोवैज्ञानिकों ने अभिवयक्ति को मुख्य साधन माना है । इसके द्धारा मनुष्य अपने मनोभावों को प्रकाशित करता तथा अपनी भावनाओ को मूलरूप देता है । एहि अक्षर गुरु के द्धारा ब्रह्म का साक्षात्कार शब्द-ब्रह्म यानि गुरु मन्त्र के रूप में होता है और जो वयक्ति पूर्ण श्रद्धा और सम्पूर्ण विश्वास के साथ शब्द-रूपी ब्रह्म, गुरु मन्त्र को धारण केर लेता हैं उसी में से वह ब्रह्म-ज्ञान रूप में प्रकट होने लगता है ।

शब्द से वेधक भी है बोधक भी है कैसे?

उत्तर:- शब्द वेधक भी है और बोधक भी हैं । शब्द साधक भी है । शब्द की मार से बना घाव जीवन भर रिस्ता रहता हैं । शब्द घायल कर देता है , चोट मरता है । शब्द बोधक भी हैं, क्योकि शब्द में प्रकाश है , बोध है, आश्वासन है , प्रियता है । शब्द में आपियता है, शब्द किसी को भी अपना बना लेता है । वयक्ति जब बोलता है तभी पता चलता हैं किस उचाई से वह बोल रहा है । वयक्ति के बोल में उसकी पूरी पीढ़िया बोल रही होती हैं । तभी कहा गया है- शब्द सम्भारे बोलिये , शब्द के हाथ न पाँव । एक शब्द आषधि करे, एक शब्द करे घाव … ।” शब्द दरिद्रता छीन लेते हैं । शब्द मारक ही नहीं तारक भी है ।

वेदों में सर्व प्रथम पूज्नीय किन्हें माना गया है ?

उत्तर:- वेदों में सर्व प्रथम ‘माँ’ को पूज्नीय माना गया है । ‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव , त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्दा च द्रविणम त्वमेव , त्वमेव सर्वम मम देव देव …||” इस श्लोक में भी इष्टदेव को सर्वप्रथम माँ के रूप में ही उद्घोषित किया गया है । माँ सिर्फ आसमान में कहीं स्थित नहीं है उसे कहते हैं ‘ या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते …” अर्थात सभी जीव जन्तुओं में चेतना के रूप में भी माँ देवी तुम्हीं स्थित हो । ” माँ आध शक्ति है, सर्व गुणों का आधार , रामकृष्ण , गौतम, कणाद आदि ऋषियों वीर-वीरांगनाओं की जननी है । इसी करण समस्त संसार ने भी माँ के गुण गाए हैं ।

गुरुदेव! रोजमर्रा में हम प्रकृति का संरक्षण कैसे कर सकते है?

उत्तर:- प्रकृति का संरक्षण केवल पहचानो और भाषाओ से नहीं हो सकता/ उसको जीवन में , व्यबहार में लाने की आवश्यकता है । प्रकृति परमात्मा की परिचारिका हैं । परभु रचित श्रिष्टि में प्रत्येक प्राणी का पोषन , रक्षक और संवर्धन प्रकृति कुशलता पूर्वक कर रही है । हमारे सर्बथा हित मंगल और उत्कर्ष के लिए ही समर्पित है- प्रकृति. अतः इश्वरिये बिधान में हमारे लिए जो हितकर है , उसकी पूर्ति का माध्यम प्रकृति का आदर हो. प्रकृति का शोषण न हो बल्कि पोषण हो । इसके लिए सबसे पहले हमें संग्रह की वृति का त्याग करना चाहिए. यदि हमारा काम एक लोटे पानी से चल सकता है तो वहा बाल्टी भर नै बहाना चाहिए. हमें मधुमखिओ से प्रेरणा लेनी चाहिए. वे फूलो से इस प्रकार पराग ग्रहण करती है की फूल को उनसे कोई नुकसान नै होता उसके सौन्दर्य में भी कोई कमी नै आती । प्रकृति से बहुत थोड़ा लेती है और बदले में हम उनसे बहुत कुछ प्राप्त करते है । हमें प्रकृति का हर सम्भब संरक्षण करना चाहिए क्यू की वही हमारा पोषण करती है ।

गुरुदेव! धार्मिक मान्यताओ का पर्यावरण में क्या सहयोग है?

उत्तर:- धार्मिक मान्यताओं का पर्यावरण में बहुत बड़ा सहयोग है जिस समय पर्यावरण की कोई समस्या नै होती थी उसी समय हमरे ऋषिओ मुनिओ ने गहरा चिंतन किया और प्रकृति विज्ञानं को धरम के साथ जोड़ने का प्रयास किया । जैसे पीपल और वटबृक्ष में जीवन दयनी शक्ति है और तुलसी में रोगनिरोधक शक्ति है- इस प्रकार की वनस्पतिओ को पूजनीय माना। जिन नदिओं से जल प्राप्त होता था उन्हें माँ की तरह पूजा गया । हमारी पुराणों में सागर मंथन की कथा आती है । कहते है पानी में विष भी है अमृत भी अर्थात पानी की शुद्धता के लिए कल्याण करि कदम उठाया जाना चाहिए । जल का परिशोधन करके शुद्ध करना चाहिए ।

प्रकृति को लेकर भारत का ज्ञान क्या कहता है?

उत्तर:- भारत का परम्परिक ज्ञान प्रकृति की छाया में ही विकसित हुआ है। भारत में त्रियक योनि के जीब जंतु भू बंदनीय है । जैसे भगवन शंकर के गले में शाप, सरस्वती का वहां हंस, गणेश की सवारी चूहा , कार्तिक्ये का वहां मोर , माँ लक्ष्मी का वहां उल्लू , माँ दुर्गा का वहां शेर आदि । यह हमारी सभ्यता में बसी प्रकृति प्रेम का ही प्रतीक है।

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