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वह कौन सी चीज है जो भगवान से दूर रखती है – Hindi


वह कौन सी चीज है जो भगवान से दूर रखती है ?

उत्तर:- अज्ञान का पर्दा… । देखिये! जब प्रभु की कृपा होती है तभी मनुष्य आनंद की अवस्था को प्राप्त करता है । जैसे अच्छा खेलने वाले खिलाडी को टीम में लिया जाता है, लेकिन अगर वही खिलाडी दो-तीन बार अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाता तो उसे टीम से बहार निकल दिया जाता है । इसके विपरीत , जिस इन्सान पर प्रभु की कृपा हो जाती है प्रभु का ज्ञान हो जाता है या जिसे प्रभु अपनी टीम में ले लेते हैं उसे कोई भी प्रभु की टीम से बहार नहीं निकल सकता । इन्सान की मर्ज़ी है कि वो दुनिया की टीम का खिलाडी बनना चाहता है अथवा प्रभु की टीम में शामिल होना चाहता है । अज्ञान का पर्दा है जो भगवन से दूर रखता है ।

संसारी वयक्ति को अंसारी (परमात्मा) कैसे याद आए?

उत्तर:- कबीर दास जी कहते हैं – ” कबीरा सांगत साधु की, साहिब आवे याद । लेखे में सोइ घडी, बाकि दिन बर्बाद–||” जब संतो का संग किया जाता है तभी परमात्मा याद आता है । उनकी सत्संगति से मानव जीवन, सत्संग तथा परमात्मा के नाम का महत्व पता चलता है तथा उसे ह्रदय में जानने की जिज्ञासा होती है । वे महान पुरुष परमात्मा के नाम व स्वरुप का बोध हृदय में करा देते हैं । नाम सुमरिन करने से उन के ऊपर जो माया का प्रभाव होता है , ऐसे दूर होता है जैसे सूर्य के उदय होने पर अंधकार समाप्त हो जाता है और आत्मा प्रफलित हो जाती है ।यदि संतो की संगति नहीं की तो परमात्मा की याद नहीं आती और जीवन का अमूल्य समय बर्बाद हो जाता है । जितनी आसक्तियाँ है संतो के संग से नष्ट हो जाती हैं– और परमात्मा की याद दिलाती हैं ।

संसारी आसक्तियों का अंत कैसे होगा?

उत्तर:- जगत में जितनी आसक्ति है उन्हें सत्संग नष्ट कर देता है ।यही कारन है सत्संग जिस प्रकार प्रभु को अपने वाश में कर लेता है वैसा साधन न योग है न सांख्य और न ही स्वाध्याय है । आसक्ति से जीव अपनी स्वतंत्रता खो कर दीं-हीन हो जाता है ।
संसार वृक्ष के दो बीज है – पाप और पुण्य । असंख्य वासनाएं जूस हैं । और तीन गुण तने है सत, रज और तम पांच भूत प्रधान शाखाएं , ग्यारह इन्द्रियाँ शाखा , शब्दा आदि पांच विषय रस हैं । जीव और ईश्वर दो पक्षी हैं । ये दोनों संसार वृक्ष पर घोसला बनाकर रहते हैं । इस वृक्ष में बात पित्र कफ रूपी तीन प्रकार की छाल है । दो प्रकार के फल लगते है, सुख और दुःख । यह वृक्ष सूर्यमण्डल तक फैला होता है । इस मंडल का भेदन करने वाले मुक्त पुरुष पुनः संसार चक्र को नहीं पड़ते जो मनुष्य शब्द रूप , रस आदि विषयो में फंसे हैं । वह कामनाओ से भरे होने के कारन गीध के सामान हैं और दुःख रूपी फल को भोगते हैं । जो जीव विषयो से विरक्त हैं , उनकी आसक्तियों का अंत होता है । और वे संसार चक्र से छूट जाते हैं ।

हमारे जीवन में गुरु की भूमिका क्या हैं ?

उत्तर:- हमारे जीवन को आंतरिक रूप से सुरु और वयवस्थित बनाने में गुरु की भूमिका जैसे एक कुम्हार जैसी हैं । जैसे कुम्हार एक सूंदर घड़े के निर्माण हेतु सतत सावधानी बरतता है कि कहीं कोई कंकड़ या पत्थर घड़े में न रह जाए , ठीक उसी प्रकार सद्गुरु हमारे अंदर से दुर्गुणों को दूर कर सत्य के मार्ग पर चलने को प्रेरित करते हैं ।गुरु के द्धारा दिए गए ब्रह्मज्ञान से मनुष्य का जीवन, दिव्य बन जाता है । गुरु वह सेतु है जिस पर चलकर शिष्य परमात्मा तक पहुँचता है।

सच्चा गुरु कौन हैं ?

उत्तर:- सच्चा गुरु वह है जो हमें सत्य का ज्ञान देता है । जो शिष्य को सही मार्ग निर्देशित करके न केवल उसके मार्ग को प्रशस्त करता है, बल्कि उसे आध्यात्मिक ऊंचाइयों कि और ले जाने में भी सहायक होता है । सच्चे गुरु के जीवन में आने से जीव और ब्रह्म के बीच का आवरण भंग हो जाता है । जिसकी कृपा से हृदय के नेत्र खुल जाए । बुद्धि कि आँखे नहीं; मन कि आँखे नहीं ; वो तो संसार के लोग खोल देते हैं । हृदय कि आँखे तो कोई सच्चा सद्गुरु ही खोलता हैं । सच्चा गुरु का मलिन भागो को दूर कर देता है तो आत्मसत्ता स्वाभाविक ही प्रकट हो जाती है ।

गुरुतत्व किसे कहते हैं ?

उत्तर:- जो जीवन को सरल बना दे , दूर को पास कर दे , अलभ्य को लभ्य कर दे , वही गुरु है । शब्द गुरु है काया और माया से जो हमें मुक्त करा दे । इस विनाशी शरीर से जो हमे अविनाशी का बोध करा दे , बिंदु से जो हमें सिंधु बना दे उस तरह को गुरुतत्व कहते हैं । गुरु केवल शरीर नहीं है, गुरु मने परंपरा, गुरु मने ब्यास , गुरु माने जहा से ज्ञान आता हो, जहाँ से बिचार आते हो , जहाँ से समाधान आता हो , जहाँ से चुनौतियों को जितने का बल मिलता हो , वह गुरुसत्ता है । गुरु एक ऐसा तत्व है जो कहीं भी विकसित हो सकता है, कहीं भी जागत हो रुकता हो , कहीं भी प्रकट हो सकता हैं । गुरु ग्रन्थ से , गुरु पंथ से , सन्देश से , संकेत से हमारा कल्याण करता है।

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