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khushi Kee Chen – Short Story in Hindi (Part-10)


प्रशंसा

कहते हैं व्यक्ति भाव का, प्रशंसा का भूखा होता हैं । भाव में वह सात समंदर पार करने की हिम्मत रखता है । प्रशंसा चाहे पल की हो.. झूठी हो – सच्ची हो.. वह जादू तो करती है । ऐसा ही तनिक सा साया के साथ हुआ जब वह किसी दुकान पर टाइपिंग करवाने गई तो देखा – वह दुकान तो तीसरी मंजिल पर थी । उसने फोन पर बात करना भी उचित नहीं समझा… सोचा – कई दिन का काम है… सीढ़ी चढ़ना मुश्किल है। आखिर वह वापिस घर आ गई ।
दूसरे दिन फोन पर बात तय हुई कि वह टाइपिस्ट नीचे आकर मैटर ले लिया करेगा ।
साया को ठीक लगा। वह पहुंच गई तो महाशय जी नीचे आ गए । उसने मैटर दिखाते हुए कहा कि यह कुछ आध्यात्मिक चिंतन की पुस्तक का काम है । रेट बता दीजिए ?
टाइपिस्ट भाई ने मैटर को थोड़ा देखा और कहने लगे- ” दफ्तर भले ही तीसरी मंजिल पर है दीदी ! पर आप यदि मेरी दुकान पर आएंगी तो अच्छा रहेगा …वह पवित्र हो जाएगी.. देखना आप आराम से सीढ़ी चढ़ जाएंगी.. आप आइए.. ? ” मुस्कराते हुए वह कहने लगा ।
बस ! इतना सुनते ही साया सीढ़ी चढ़ने लगी। जिस ऊंचाई को देखकर उसे डर लग रहा था वह पता भी नहीं चला.. . तीन मिनट में वह ऊपर पहुंच गई ।

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नसीहत

चांदनी बहुत अच्छी वक्ता है। उसका बयां करने का एक अपना ही अलग अंदाज है । उसके शब्द लोगों के दिलों में घर बना लेते हैं लेकिन कभी कभी हंसी-मजाक में वह सामने बैठे हुए किसी श्रोता को बहुत हल्के स्तर के शब्द भी बोल देती है । जो कई बार वहां उपस्थित जनों को अच्छे नहीं लगते ।
कुछ दिन पहले भी ऐसा ही हुआ था।
आखिर समारोह की समाप्ति पर एक विद्वान जो पंजाब यूनिवर्सिटी से रिटायर्ड प्रोफेसर हैं उन्होंने चांदनी को
अपने पास बुला कर कहा, ”बेटा ! एक बात कहूं तो बुरा तो नहीं मानोगी ?”
”नहीं सर ! आप चार कहिए ।”
“आप इतना अच्छा बोलती हैं कि आपके शब्द मेरे कानों में गूंजते रहते हैं और उससे भी कहीं अधिक वह दो शब्द जो किसी का उपहास उड़ाते हैं । याद रखना बेटी ! वक्ता जितनी जल्दी से अच्छे शब्दों द्वारा ऊपर चढ़ता है उससे भी कहीं अधिक जल्दी नकारात्मक प्रभाव द्वारा , श्रोताओं के उर से उतर भी जाता है …।

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खुशी की चेन

अनुभव कहता है जब हम खुश होते हैं तब पूरा वातावरण भी महकने लगता है इसके विपरीत जब दुखी होते हैं तब चारों ओर भी चुप्पी छाई रहती है ।
31 दिसंबर का उदासी भरा दिन था।न जाने क्यों चाह कर भी तिनका भर खुशी पास न आ रही थी। रात को नौ बजते ही समता बिस्तर पर करवटें लेने लगी ।
उस रात एक गुलाब के फूल जैसा गुलाबी सपना आया। बस.. उसी से मन खुशी से झूमने लगा ।
एक जनवरी का दिन…जल्दी से उठी और अधूरे पड़े कई काम समेट दिए।
नहा धोकर पूजा समाप्ति के पश्चात
अंजलि के पास जा खड़ी हो गई । जैसे ही वह उसको निहारने लगी तो वह समता की तरफ देखकर मुस्कराने लगी।
“बता तेरी क्या सहायता करूं ..?”
जैसे ही समता ने उससे पूछा तो वह बोली – “मेरी… मेरा तो कोई काम नहीं।” इतना कहते ही वह खिलखिलाकर हँस पड़ी। सांवले से रंग में वह बहुत सुन्दर लग रही थी । उसके बाद तो जैसे उसे पर लग गए थे । जल्दी जल्दी काम करने लगी और उसने पूरी रसोई चमका दी।
समता हैरान थी इसे आज हो क्या गया है ।
शायद उन्हीं शब्दों को जादू था जिन्हें सुनकर वह खुश- खुश नजर आ रही थी । घर का पूरा वातावरण ही बदला गया था ।

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बरसात का दिन

बरसात हो रही थी । शिखा छोटी बेटी के संग बरामदे में खड़ी सोच रही थी कि पहले सभी घरों में गेट बरामदे के बाद अंदर लगा होता था । जब भी कभी बरसात शुरू हो जाती तो आते-जाते राही बरामदों में ठहर जाते और बरसात से बच जाया करते लेकिन आजकल हर घर के बरामदे के बाहर बड़ा सा लोहे का गेट लगा हुआ है जिस कारण कोई भी प्राणी बरसात से बच नहीं सकता.. . यही सोच सोचते हुए शिखा छाता लेकर. …. बेटी के संग गेट पर जा खड़ी हुई । उसने जब बेटी से कहा- “देखो ! पेड़ के नीचे खड़ी हुई वह गाय कैसे भीग रही है… उस किनारे दीवार से सटा हुआ कुत्ता भी कांप रहा है ।”
तब छोटी सी बेटी बड़ी मासूमियत से बोली,- यदि हम सामने
छत बना दे तो सा… री गाएं कुत्ते उसके नीचे बैठ सकते हैं।
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छोटी सी जिद्द

न जाने क्यूँ उस दिन सुबह से मन ने एक जिद्द पकड़ रखी थी “मुझे तुम्हें देखना है… मुझे तुम्हें देखना है… किसी भी तरह …इसी वक्त… पर कैसे देखूँ …कहां से देखूँ…. वर्षों हो गए ….न कोई अता-पता ?”
आखिर सोचा- गूगल बाबा किस काम के ….चलो! कोशिश करके देखती हूँ।
नेट खोला… तुम्हारे नाम के भांति- भांति के चेहरे दिखाई दिए। किसी की उम्र सोलह वर्ष.. किसी की बीस-पच्चीस तो किसी की पैंसठ … ।
उन्हें देख कर मैं मुस्कराने लगी क्योंकि मुझे तलाश थी पचपन की….। बहुत से चेहरे मिले पर तुम्हारा नहीं । फिर से कोशिश की .. आखिर… भीतर से खिलखिला उठी मैं…तुम्हारा चेहरा देख कर । ‘मिल गया… मिल गया ।’ जल्दी से क्लिक किया फिर तो मेरे -तेरे… एक ही गांव का …नाम भी मिल गया था …. । इसी खुशी में मेरे संग-संग नन्ही सी जिद्द भी नाचने लगी थी … ।

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मेरे पापा

सुबह नौ बजते ही मैं ड्यूटी पर निकल जाता हूँ। माँ सारा दिन घर के काम में जुटी रहती हैं । सरकारी नौकरी से अवकाश प्राप्त पापा रोज़ घर में माँ के साथ छोटे -मोटे कामों में हाथ बंटाते हुए एक ही बात कहते हैं ‘मैं कुछ नहीं करता ।’
मुझे पापा की यह बात बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगती । सोचता हूँ – पापा ने अपनी प्रत्येक जिम्मेदारी को अच्छे से निभाया है और निभा रहे हैं । मुझे कमाने योग्य बनाया । थोड़ी सी तनख्वाह में छोटी बहन को पढ़ा -लिखा कर डाक्टर बना दिया । इससे भी बढ़कर उनकी स्वयं की आवश्यकताएँ ना-मात्र हैं । सर्वसम्पन्न घर में…. कड़कती ठंड में उन्हें बलोयर नहीं चाहिए..
न ही उन्हें गीजर का गर्म पानी चाहिए…नल के पानी से ही नहा लेते हैं और ऊपर से कहते हैं कि ऐसे नहाने से शरीर बीमारियों से बचा रहता है। दरवाजों के छेदों में से आ रही हवा से बचने के लिए कोई पुरानी चादर तान लेते हैं ।
गरम कपड़े भी कई-कई दिन तक पहन लेते हैं …कहते हैं रोज़-रोज़ धोने से कपड़े खराब हो जाते हैं और फिर पानी भी ज्यादा लगता है… कितने गिनाऊँ मैं उनके काम.. ।
घर में कोई टूटी खुली देखते हैं तो तुरंत कसकर बंद कर देते हैं।
गर्मी में बैठे रहते हैं पेड़ की ठंडी-ठंडी छाँव में… घर के छोटे-मोटे काम साइकिल पर ही निपटा आते हैं .. कितना करते हैं मेरे पापा… ।
बिजली, पानी,पैट्रोल….हर छोटी- छोटी बात का ध्यान रखते हैं और फिर भी कहते हैं “मैं कुछ नहीं करता । ” आप ही बताइए – कया ठीक कहते हैं मेरे पापा ?

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