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क्या किसी से वरदान मिलने पर भी सफलता मिल जाती है – Hindi


क्या किसी से वरदान मिलने पर भी सफलता मिल जाती है?

उत्तर:- किसी समय सफलता प्राप्ति में वरदानों का बड़ा योगदान रहा है। लेकिन आज के युग में वरदान पुरानी किताबों के किस्से हो गए हैं जब किसी की दिव्य वाणी विशेष प्रयोजन के लिए सत्य हो जाए तो इसे वरदान माना गया था। अब इंसान की रसना इतनी प्रभावशाली नहीं रही कि वरदान जैसे शब्द प्रसव ले सके। इस मामले में जिहवा बांझ सी हो गई है। हां, आशीर्वाद अभी भी गूंज रहे हैं। अंतरात्मा से आशीर्वाद दिया व लिया जाता है तो ये वरदान का विकल्प बन कर कई बार सफलता में सहायक सिद्ध होते हैं।

सृष्टि के विस्तार का मूल क्या है ?

उत्तर:- सृष्टि के सफल विस्तार का मूल है- संकल्प। शुभ संकल्प हमारी दिशा और दशा को कल्याणकारी बना सकता है। मनुष्य स्वयं के संकल्प एवं सोच का परिणाम है। शुभ संकल्प लोक परलोक की विजय का आरंभिक साधन है।

राम बुलावा भेजिया कबीरा दीना रोए’ इसका अर्थ क्या है?

उत्तर:- राम बुलावा भेजिया , कबीरा दीना रोए। जो सुख प्रेमी संग में सौ वैकुंठ न होए।” अर्थात भक्त प्रेम के आनंद में वैकुंठ का निवास तुच्छ मानता है और इसको प्रेम के वातावरण से निकाल कर प्रेमीजनों से पृथक करके स्वर्ग ले जाने की बात कही जाती है तो वह रोने लगता है,.उसे अपार दुख होने लगता है। प्रेम का आनंद ऐसा ही आनंद है। किंतु, प्रेम में इस प्रकार अनिवर्चनीय आनंद की प्राप्ति तभी होती है जब वह सच्चा एवं निस्वार्थ हो।

क्या प्रेम भी झूठा होता है?

उत्तर:- बहुत बार लोग अपने मतलब से बड़ा प्रेम दिखलाने लगते हैं। झूठा प्रेम शत्रुता का नीवं होता है। दुख और कलेश का आधार होता है। बहुत से लोग इसे प्रवचना में आ भी जाते हैं। स्वार्थी व्यक्ति का प्रेम स्वार्थ निकालने के बाद समाप्त हो जाता है ऐसे में वह जिसे प्रेम करता था उस प्रेमास्पद की ओर आंख उठाकर भी नहीं देखता अथवा मिलने पर पीठ कर लेता है। उसका यह व्यवहार बुराई, मनोमालन्य अथवा शत्रुता का सूत्रपात कर देता है। इसलिए कहा गया है कि एक बार प्रेम भले ही न किया जाए पर स्वार्थपूर्ण प्रेम का नाटक न किया जाए नहीं तो हित के स्थान पर अहित ही होता है

भक्त के बस में भगवान यह कथन कहां तक सच है?

उत्तर:- भक्त के वश में भगवान यह कथन आज नया नहीं है। यह युगों से अनुभूत किया हुआ एक सत्य है। जिन महात्माओं, संतों और साधूजनों ने भगवान की भक्ति की है, उससे निश्चल प्रेम किया है, उन्होंने भगवान को अपने वश में कर लिया है। तुलसी, सूर, मीरा, नानक आदि संत इसके प्रमाण हैं। प्रेम का यह प्रमाण कोई चमत्कार नहीं बल्कि यह एक आध्यात्मिक तथ्य है। प्रेम की हिलोरें जिस मानस में उठती है, जो सहृदय भक्त संसार के अणु-अणु में अपने प्रस्पद परमात्मा को ही देखता है उसकी आत्मा का स्तर असाधारण कोटि तक उन्नत हो जाता है। उसमें समग्र दिव्य गुणों का विकास होने लगता है। जिससे महान और पवित्र कर्म ही करता है। समाज अथवा आत्मा विरोधी कर्म उससे हो ही नहीं सकता ऐसे सुकर्मा और पवित्र भक्त भगवान स्वयं ही आसक्त हो जाती हैं। यह कथन शत-प्रतिशत सही है।

शिष्य गुरु कृपा को प्राप्त कैसे करें?

उत्तर:- गुरु कृपा का विशेष अनुदान पाने के लिए एक मात्र रास्ता है : गुरुध्यान, गुरुभक्ति , गुरुसेवा, गुरुकार्य,एवं गुरुआज्ञा पालन । जब यह सब संकल्पित हो केर किया जाता है तो शिष्य की भक्ति, निष्ठां की शक्ति में बदल जाती है एवं पूर्णाहुति के साथ ही उसे मिलता है, गुरु का विशेष अनुदान, गुरु का विशेष आशीर्वाद जो की शिष्य के जीवन को दिव्यता में बदल देता है । इससे शिष्य का आत्मिक कायाकल्प तो हो ही जाता है साथ ही उसे भौतिक जीवन की परेशानियों से भी मुक्ति मिल जाती है एवं और भी ऐसा बहुत कुछ प्राप्त होता है जो हमारी कल्पनाओ से परे है जिसे शब्दों में वयक्त नहीं किया जा सकता उस शिष्य स्वयं ही अपने जीवन में अनुभव केर सकता है ।

संत किसे कहते है और वह हो?

उत्तर:- संत शब्द संस्कृत ‘सत ‘ के प्रथा का बहुबचनात्मक रूप है , जिसका अर्थ होता है – सडजन और धार्मिक वयक्ति । हिंदी में साधु पुरुष के लिए यह शब्द व्यवहार रूप में आया । कबीर , सूरदास , गोस्वामी तुलसीदास आदि पुराने कवियों ने इस शब्द का व्यवहार साधु और परोपकारी पुरुष के अर्थ में बहुत किया है । और उसके लक्षण भी दिए हैं । लोकोपकारी संत के लिए यह आवश्यक नहीं की वह शास्त्रज्ञ तथा भाषाविद हो । उसका लोकहित कार्य ही उसके संतत्व का मानदंड होता है । संत सदा मानव को जोड़ने का कार्य करता है और उसका आशीर्वाद सब पर बराबर का रहता है । वह सभी धर्मों का आदान सम्मान करता है।

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