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Maa Ka Room – Short Story in Hindi (Part-4)


माँ का कमरा

माँ! तुम्हारा कमरा तैयार करवा दिया। उसमें टी.वी., ए.सी, दो कुर्सी, मेज़, धार्मिक किताबें सब कुछ रखवा दिया। कल से यह कमरा मिंटू की पढ़ाई के लिए हो जाएगा और आप ऊपर के कमरे में आराम से रहना। यह लो! नया मोबाइल भी….।
माँ ने नज़रें नीची किए हुए मोबाइल पकड़ लिया। बेटे को लगा- शायद मां इतने में भी खुश नहीं है। उसने फिर पूछा- बताओ माँ! क्या चाहिए जो कहोगी वही हाज़िर कर दूँगा। मां कहने लगी, नहीं बेटा! कुछ नहीं चाहिए- मुझे तो गांव से ही अकेली रहने की आदत है, आराम से रह लूँगी। मां तुरंत ही ऊपर के कमरे में चली गई।
दादी के भाव की पोते को भनक लग गई। वह तुरंत ही अपनी मम्मी के पास गया और कहने लगा, मम्मी! मुझे ऊपर का कमरा चाहिए, दादी नीचे के कमरे में ही रहेगी।
हाँ बेटा! मैं तो पहले से ही तेरे पापा से कह रही थी, माँ को नीचे ही रहने दो पर माने ही नहीं।
आखिर मम्मी और मैंने पापा के आने से पहले ही माँ को नीचे शिफ्ट कर दिया और मेरा सामान ऊपर रख दिया।
जब पापा वापिस आए तो दादी माँ उन्हें खरी-खोटी सुनाने लगी, “क्यों रे निक्कमे! तू मुझे मेरे पोते-बहू से अलग करना चाहता है…?”
पापा टुकर-टुकर हम दोनों की ओर देख रहे थे कि यह हो क्या गया।
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बेटी के शब्द

माँ अब भी अपने बच्चों का ध्यान आप ही रखती है क्योंकि बेटा-बहू दोनों कमाने जाते हैं। पहले वह एक का ध्यान रखती थी अब दो का रखती है। जब उससे घर में चार सदस्यों का काम नहीं होता था तो सोचती थी बहू आएगी पर…।
दूसरी तरफ ससुराल से घर आई बेटी को माँ ने कहा- तुम्हारी दो बेटियाँ हैं यदि एक बेटा और हो जाता तो सुख हो जाता…। बेटी कहने लगी, मेरी दो बेटियाँ तो तुझे क्या तकलीफ है, क्या तू सुखी है- अब दोगुना काम करती है- मुझे बेटा नहीं चाहिए। तुम पहले भी रखती थी बच्चों का ध्यान अब भी रखती है। बच्चों के बच्चे बड़े हो गए पर तुम्हारा वही हाल…। मुझे नहीं तेरी तरह सीनियर बाई बनना।
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उसकी याद

उस दिन सर्वोदय भवन में समारोह की समाप्ति के पश्चात बाहर आकर देखा तो थोड़ा अंधेरा हो गया था। गपशप में ऐसे ही पंद्रह मिनट निकल गए। सभी साथी जा चुके थे। मेरे एरिया में जाने वाला कोई नहीं था और न ही कोई साधन मिल रहा था। आखिर… दूर से एक रिक्शा दिखाई दिया और वह भाई जाने के लिए भी तैयार हो गया।
घर पहुंच कर … उसका हक अदा करते हुए मैंने उससे पूछा – ठीक है भैया? रिक्शा वाला बोला
“अगर आप कम भी दे देते मैं तो वह भी ले लेता। मैं कभी किसी से पैसों के लिए झगड़ा नहीं करता ।”
इतना कहकर वह तो चला गया पर उसकी संतुष्टि भरे शब्द मेरे कानों में बजने लगे… ।

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गलती पर गलती

जब हम किसी काम को बिना सोचे विचारे करते हैं तो गलतियां हो ही जाती हैं। उसके साथ भी वही हुआ।
बेटी को ससुराल जाना था। उसने स्वयं ही ड्राइविंग करनी थी। संगीता ने कहा कि धुंध बहुत है, पहुंचते ही फोन कर देना ।
कुछ घंटों बाद आफिस से पति ने फोन करके पूछा, “क्या वह पहुंच गई … श्वेता का फोन आया ?”
“नहीं आया … भूल गई होगी….. ।” उसने कहा।
“अभी पूछो, मैं तुम्हें फिर से फोन करता हूं। ”
(आफिस का फोन था उससे सिर्फ यूनिवर्सिटी के भीतर ही कॉल कर सकते थे।)
संगीता ने बेटी को अपने मोबाइल से फोन किया पर व्यस्त था… नहीं मिला। वह नाश्ता करने बैठ गयी।
आफिस से फिर से फोन आया तो उसने उठाते ही कहा “नाश्ता तो कर लेने दो, मैंने किया था नहीं मिला।”
” यह डी. ओ . आफिस का नंबर है ? किसी ने पूछा।
“ओ ..जी नहीं …क्षमा करना। ” शर्मिन्दा होते उसने जल्दी से रिसीवर रख दिया ।
थोड़ी देर बाद जब फिर से घंटी बजी तो बताया, ” पता है अभी क्या हुआ.. किसी और का गलत नंबर लग गया और मैंने सोचा कि आपका है ..बिना ‘हैलो’ किए ही बोल दिया… नाश्ता तो कर लेने दो… ”
“मैडम! अब भी वही फोन है ।” उधर से आवाज़ आई ।
उसने झट से रिसीवर रख दिया ।
सब कुछ जानती थी…. कैसे बोलते हैं, कैसे बात करते हैं पर पता नहीं क्यों कैसे उस दिन वह गलती पर गलती कर बैठी।
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दरवाज़ा

क्षण भर का क्रोध अपना नुकसान तो करता ही है साथ में दूसरों के दुख का कारण भी बनता है । ऐसे समय में कई बार स्थिर वस्तुएँ भी हमारी प्रेरणा का स्रोत बन जाती हैं।
उस दिन जब किसी छोटी सी बात को लेकर इन्होंने मेरा कहना नहीं माना तो मुझे क्रोध आ गया… पहले पैर जमीन पर पटकने लगी फिर बर्तन पटकने लगी… जब क्रोध शांत नहीं हुआ तो दरवाजे पर उतारा… पूरे जोर से उसे बंद किया। ऊँची आवाज सुनते ही मेरी दृष्टि कंपकंपाते अधखुले दरवाज़े से जा टकराई । वह कुछ देर के बाद पहले की भांति शांत हो गया। मैं देखती रह गई और सोचा – मैंने इस बेजान पर अपना क्रोध उतारा… चीखा… कराहा.. कांपा दरवाजा और सामान्य हो गया । टूट भी जाता तब भी कुछ न कहता और मैं मूर्ख….। शांत कर दिया उसने मुझे…।
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