bedpage.com
Think Smart Think Digital!

Masoom Chehra – Short Story in Hindi (Part-5)


गुड़िया

उन दिनों पाँचवी मंजिल पर रहते थे हम। नववर्ष का पहला दिन…पर पूरी बिल्डिंग में सन्नाटा….. कारण…? गुड़िया का इकलौता बाईस वर्षीय भाई जो कुछ दिन पहले भगवान ने छीन लिया था। चंचल सी गुड़िया जो हर वर्ष नववर्ष के आगमन पर सबसे ज्यादा उछलती कूदती थी इस बार बंद थी घर के भीतर । कौन जाए… बुलाए …खुशियाँ मनाए… ।
आखिर हिम्मत करके मैंने ही उनका किवाड़ खटखटाया। उसी गुड़िया ने दरवाजा खोला और हंसते हुए कहा –
“नमस्ते आंटी ! हैप्पी न्यू ईयर ”
मैं मुस्करा दी और उसे चाकलेट दिया…..फिर आंखों में आंसू भर.. वह मेरे सीने से लिपट गई… ।
___________

भाव

दादी रामरत्ती के दोनों बेटे जब से अलग रहने लगे थे। तब से दादी घरों में मांग-मांग कर गुजारा कर रही थी। दीवाली का त्यौहार आने वाला था। दादी घर आई तो खाने-पीने का सामान लेकर भी खुश नहीं लग रही थी। ऐसा लग रहा था वह कुछ और भी चाहती है पर संकोच वश कह नहीं रही। मेरे कई बार अनुरोध करने के पश्चात् वह बोली , ” लाली! (बेटी!) कोई कांच की पुरानी चूड़ियाँ पड़ीं हों तो…पहन लूंगी .. मेरे हाथ खाली हैं?

मेरे पास पीतल की नई चूड़ियाँ रखी थी । मुझे उनका ध्यान आया। दादी को वह चूड़ियाँ दिखाई तो उसे पसंद आई और तुरंत पहन भी लीं। कहने लगी- यह चूड़ीयाँ तो लाली! बहुत सुंदर लग रही हैं।
ढेरों आशीर्वाद देती हुए वह चली गई। लेकिन उस समय उसके चेहरे के जो भाव थे, वह सोना पहनने से ज्यादा खुशी वाले थे।
__________

मां की बात

अक्सर माँ बात- बात पर नसीहत देती रहती। उसका रोकना- टोकना मुझे अच्छा नहीं लगता था। आज सोचती हूँ कि वह ठीक तो कहती थीं। उनकी हर बात में उनका अनुभव बोलता था जिसे मेरी कच्ची सोच समझने में असमर्थ थी।
एक दिन माँ मेरे पास आई और कहने लगी, ” ए संतोष! एक बात कहूं , इआ कविता लिखना ईब तो छोड़ दे । हाडे तेरे आगे हाथ जोड़ूं बेटी! ये आंखें काम आएंगी। आपां तो तेरे दिमाग वास्ते कमैं …आगे तेरी मर्जी ।” सास मां ने कहा।
मैं काम छोड़ कर लेट गई। थोड़ी सी देर लेट कर उठी तो पुन: बोली- ” सो ली.. हम भी गांव में यूँ ही करिआ करदे, नूं कैंहदी इतने टेढ़े होवेंगे.. दो निचली (चरखे पर सूत कातना) नी भर लूंगी… वे भी बरत न पाई। दूसरियाँ ने बरते।” ठंडी सांस भरते मां ने कहा।
कितना गहरा चिंतन छिपा था उस चिंतामयी बात में…।

___________

प्रबंधन

सुबह होते ही जैसे ही बाहर निकली तो एक वृद्धा से राम राम हुई और बातों का सिलसिला शुरू हो गया।
मैंने कहा – मैं जब भी सैर करने जाती हूँ तब कोशिश करती हूँ कि एक ही लकीर पर चलूं । जब तक सही चलती हूँ तब तक विचार भी भूत भविष्य की ओर नहीं भागते परन्तु जैसे ही लकीर से हट जाती हूँ तब विचार भी भूत भविष्य की ओर भाग रहे होते हैं । मैंने देखा है वर्तमान में रहने के लिए अनुशासन आवश्यक है। यदि स्वयं पर ही शासन नहीं, प्रबंधन नहीं तो मन संकल्प-विकल्प में उलझेगा ही…. मैं हर चीज़ का प्रबंधन करके चलती हूँ…।
” क्या आप वक्त का प्रबंधन जानती हैं?” मेरी बात को बीच में काटते हुए उस मां ने कहा ।
वक्त का प्रबंधन…. जीअअ… ओ-हो… एक घंटा हो गया बात करते हुए…पता ही नहीं चला मुझे। क्षमा करना।
वह वृद्धा मुस्करा कर चल दी। ऐसा लगा जैसे उसने मुझे नसीहत भरा थप्पड़ मारा हो कि उपदेश देने की वस्तु नहीं …ग्रहण करने की है।

___________

भोला चेहरा

जिंदगी के पुराने पन्ने पढ़ते हुए स्वयं की ही लिखी पंक्तियां पढ़ने को मिलीं, ” हमें किसी एक जरूरतमंद की जितनी हो सके सहायता करनी चाहिए।”
पंक्तियां पढ़ते ही विचार आया कि तुम्हारे पास तो इतने कपड़े पड़े हैं, किसी ने पहनने भी नहीं हैं …इस काम वाले लड़के को दे दो । तुरंत ही मेरे आलसी मन ने कहा, “निकालने मुश्किल हैं , कल दे देना।”
फिर मुझे कवि रहीम जी का वह दोहा ध्यान आने लगा… “कल करे सो आज कर, आज करे सो अब।”
जल्दी से मैं उठी और मैंने साड़ी-सूट, पैंट- शर्ट इत्यादि की बड़ी गठरी बांध के रख दी ।
दूसरे दिन सुबह जब वह लड़का आया तो उसे वह कपड़े दे दिए। कपड़े लेकर वह बहुत खुश हुआ और कहने लगा, ” सभी काम आ जाएंगे जी, घर में माँ है… बहन है…, अब मुझे खरीदने नहीं पड़ेंगे….।
वह चला गया और मुझे उसका भोला सा वह चेहरा आज भी याद आता है…. ।

___________

Have any Question or Comment?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *