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Memories of Gifts – Short Story in Hindi (Part-12)


इतना ही सुनता है

वह जब छोटे थे- दोनों रोज़ लड़ते कि मां मेरी ओर सोएगी-मां मेरी ओर सोएगी। आखिर मां झगड़ा निपटाते हुए कहती , लो! मैं बीच में सो जाती हूँ। इतना सुनते ही दोनों चुप हो जाते।
अब… एक ही द्वार है कोठी का… । दाँई ओर छोटा भाई, बाँई ओर बड़ा भाई रहता है। अब भी मां आँगन के बीच चारपाई बिछा के बैठती है… और उसे सुनाई कम देता है। बस! टुकर-टुकर कर दरवाजे को ताकती रहती है। कोई नहीं कहता, मां मेरी है- मां मेरी है। कभी जब ध्यान देती है तो इतना ही सुनता है, अब रोटी की बारी तेरी है- शाम को मेरी है…।

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मक्खियाँ

कई बार छोटे-छोटे जीव – जंतु भी आत्म-मंथन करने को मजबूर कर देते हैं।
हुआ यूं – बहुत देर से मुझे छोटी – छोटी दो मक्खियों ने परेशान कर रखा था । मैं उन्हें बार-बार बाहर निकालने की कोशिश कर रही थी । खिड़की खोलकर भगाती तो ऐसा लगता कि बाहर निकल गई परन्तु जैसे ही झट से खिड़की बंद करती तो फिर से कमरे में मंडराते हुए देखती । उन्हें निकालने के कई यत्न किए पर सभी व्यर्थ । सोचने लगी – इस ईंट पत्थर के घर में घुसीं दो मक्खियों से तो मैं इतनी व्याकुल हो रही हूँ पर मुझे मेरे मन मंदिर में मंडरा रही विषय विकारों की हजारों – हजार मक्खियाँ कभी नजर नहीं आई । उनसे कभी परेशानी नहीं हुई । क्या कभी उन्हें निकालने की कोशिश की… ।

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शहीद की पत्नी

आज व्हाट्एप्प पर एक चित्र देखा जिसमें एक माँ अपने छः सात साल के बेटे को फौजी ड्रेस पहनाकर, हैंगर में टँगे हुए ओवर-कोट की दाँई बाजू में हाथ डाले उसके संग खड़ी है।
न जाने क्यों मैं बार-बार थोड़ी देर बाद उस चित्र को देख लेती हूँ और फिर रो पड़ती हूँ। रात को भी लेटे हुए यही चित्र मेरे दिमाग घूमता रहा।
इस चित्र को मैंने और ग्रुप्स में भी भेजा। कई कवियों ने श्रद्धांजलि रूप में कविताएं लिखी। जब बेटी को दिखाया तो देखते ही वह ठंडी-साँस भरते हुए बोली, “मम्मी! वह तो एक बार शहीद हुआ। तो जीते-जी रोज़ शहीद होगी।”

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उपहार

छोटे-छोटे उपहार याद दिलाते हैं हमें बीते दिनों की। उन्हीं से प्रेरणा मिलती है कि हम भी आने वाली पीढ़ी को कुछ देकर जाएं। कोई ऐसी वस्तु जिसे वह सहेज कर रख सकें। भले ही वह भाव हों, विचार हों, शब्द हों अथवा ज्ञान हो।
सीता भी शादी के कुछ दिन पश्चात जब मां के घर गई तो उसकी दादी ने उसे अपने संदूक से निकाल कर दादाजी की पुरानी चांदी की गोल- गोल अनमोल घड़ी दी जिसे वह अपने गले में डाल कर रखा करते।
यूँ तो कहने मात्र को वह छोटी सी वस्तु थी परंतु अब जब भी कभी वह अलमारी में रखी उस घड़ी को देखती है तो दादा जी का चेहरा आंखों के सामने आ जाता है।
सोच रही थी.. दादी का दिया हुआ यह छोटा सा उपहार कितना आनंद देता है। दरअसल देने की परंपरा हमें जोड़ कर रखती है।
यही सोच कर सीता ने भी अपनी आठ महीने की नन्ही सी पोती पवित्रा के लिए, हाथ के सूई धागे से सिलाई कर के नाईट सूट पहनाया।

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