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Mere Hisse Kee Rotee – Short Story (Part-11)


विचार बदल गया

मुझे बहुत गुस्सा आया हुआ था । न जाने क्यूँ मैंने सोचा – “व्हाट्स एप, फेसबुक व फोन पर बहुत बातें हो ली… इस बार हाथों से पत्र लिखती हूँ …सारी बात क्लीयर हो जाएगी।
मुझे उसके साथ रहना ही नहीं है.. अपने आप को समझता क्या है… जब उसे मेरी चिंता नहीं मैं क्यूं करूँ? शर्म नहीं आती उसे… एक साल से माँ के घर बैठी हूँ …लेने नहीं आया मुझे। सहज स्वभाव में ही तो राखी पर आई थी। मुझमें कमियां गिनवाता है.. वह भी और उसकी माँ भी । अरे! यदि उसमें कोई कमी होती …अथवा शादी के दूसरे दिन ही किसी भी एक्सीडेंट में
कोई भी कारण बन जाता तो क्या मैं उसे छोड़ कर चली आती ? नहीं.. बिल्कुल न आती… सारी उम्र निभाती…जी जान लगाकर सेवा करती.. । बस… बहुत हो गया। मैं पढ़ी लिखी हूँ.. कमाती हूँ… ।”
बहुत कुछ सोचा मैंने लिखने के लिए लेकिन बस इतना ही लिख पाई.. “तुम यह मत सोचो कि मैं तुम्हारे बिन नहीं रह सकती …हां ! यह मत सोचो…. ( बस इतना ही लिखा था कि विचार बदल गया । मेरा अहम टप-टप करते आँसूओं में टूटने लगा…।)….नहीं रह सकती………
शायद… नहीं रह सकती…. नहीं रह सकती… तभी तो लिख रही हूँ … ..कब आओगे.. ?”
आंसुओं से भीगा वह पन्ना पोस्ट कर दिया था।
तीन दिन के बाद… . मेरी खुशी का वह सबसे बड़ा दिन था… छोटे से विचार ने मेरी दुनिया ही बदल दी ।

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क्या करते हैं हम

उस वक्ता के शब्द सभी को अच्छे लगते हैं उसकी प्रस्तुति का अलग अंदाज दिलों को छू जाता है । वह शक्ल-सूरत से इतना अच्छा नहीं है फिर भी वह जादू करता है । इसके विपरीत जब वह दूसरों का उपहास उड़ाते हुए कभी – कभी कह देता है , “तुमने जो कहा वह तो आम बात है यदि मशहूर होना है तो गलत करो उसी वक्त छा जाओगे…. दुनियां में ऐसे ही खास बड़ा आदमी बना जाता है ।” तब वह अच्छा नहीं लगता ।
खैर! यदि कोई वक्ता दूसरों में गलतियां निकालते हुए ऐसे औरों की नकल उतारेगा तब श्रोताओं के उर से उतनी ही जल्दी उतर भी जाएगा जितनी जल्दी वह ऊँचा उठा ।
अपनी बात कहने में कोई परहेज नहीं .. हां! यदि दूसरों में गलतियां ढूंढोगे तो वक्त बरबाद करोगे……….. बहुत धीरे से .. धीमी सी… .. भीतर से आवाज आई , “तुम क्या कर रही हो..?”

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मेरे हिस्से की रोटी

बहुत भूख लगी थी। जल्दी से मोटी-मोटी
दो रोटी बनाई और रात की बची हुई सब्जी के साथ परोस कर, आँगन की गुनगुनी धूप में बैठ खाने लगी।
अभी एक ही कोर खाया था और दूसरा तोड़ने लगी थी कि बाहर घंटी बजी। देखा तो – कोरियर वाला था। जैसे ही परत कर आई तो इतनी देर में वह रोटी बिल्ली उठा ले गई । दीवार पर रोटी लिए बैठी वह मेरी ओर टुकर-टुकर निहार रही थी।
उसे देखते ही कुत्ता भोंकने लगा। वह डर कर भागी और रोटी नीचे गिर गई। कुत्ता वहाँ तक पहुंच भी न पाया था कि दहलीज पर भीख मांगने आए बच्चों ने वह रोटी उठा ली। छीना -झपटी करते हुए थोड़ी दूर जाकर उन तीनों बच्चों ने उसकी बोटी-बोटी कर दी। एक- एक टुकड़ा खाते हुए वह मेरी ओर देखकर मुस्करा रहे थे और उस समय मुझे याद रही थी मेरी दादी..जो पहली पांच रोटी गाय, ब्राह्मण, कौआ, कुत्ता और सफाई वाली शीला की निकालती थी।

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रिटायर आदमी

जगदीशचन्द्र को रिटायर हुए पूरा एक साल हो गया। इसी जनवरी के महीने में तो रिटायर हुआ था। पूरे सात साल प्रोफेसर एण्ड हैडॅ रहा। छः छः कोटपैंट जो उस समय कम लगते थे, अब पहनने का मौका ही नहीं मिलता। पत्नी है, जो पहले भाग-भागकर उसका सारा काम करती थी, अब कई बार कहने पर भी नहीं सुनती।
आज ही की बात है कि वह सुबह से कह रहा था कि मेरे कपड़े प्रेस कर दो। परन्तु वह उलटा जवाब देते हुए कहने लगी, “क्या प्रेस-प्रेस लगा रखी है, आपको कहीं जाना तो है नहीं।”
उसने कहा, “अरे! मैं एक सप्ताह से यही पैंट पहन रहा हूँ।”
तो कहने लगी, “फिर क्या हुआ।”
“परसों मेरा लंच है कहीं, कोट-पैंट पहनूँगा….।”
“अच्छा…! आप कोट-पैंट पहनेंगे। कितना खुश हो रहे हो जैसे कभी कोट-पैंट पहना ही नहीं हो….।”
जगदीशचन्द्र और उसकी बीवी दोनों हँसने लगे….।

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जज की विनम्रता

हमारे घर में छोटी सी समारोह पार्टी थी। पति के दोस्तों में एक श्री गुरूकिरण जज भी थे। परिवार में सभी को ऐसा लग रहा था कि जज आएंगे ठीक से व्यवस्था होनी चाहिए क्योंकि वह अभी तक कभी घर नहीं आए थे। पता नहीं वह कैसे होंगे। कितना लेट आएंगे।
खैर! वह ठीक समय पर सपत्नीक पहुँच गए। बहुत ही सरल-सहज स्वभाव। जैसे ही मम्मी ने रूहअफ़जा बनाकर उन्हें गिलास पकड़ाया तो उन्होंने गिलास की ओर देखा और ऊँगली से कुछ निकाल कर बाहर फैंक दिया।
मम्मी ने पूछा, “क्या हुआ कुछ पड़ गया था क्या?”
“नहीं-नहीं ऑटी! कुछ नहीं… मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।”
“कुछ तो होगा… क्या था उसमें?”
“नहीं आँटी! ज़रा सी कीड़ी थी… मैंने निकाल दी और रूहअफ़जा पी लिया। मेरा फेवरेट है- रूहअफ़जा। मुझे तो एक गिलास और भी चाहिए।”

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