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Sachcha Paramaarthee Shishy Kaun Hai in Hindi


गुरु कृपा किसे कहते है, गुरु का जीवन में महत्वा क्या है?

उत्तर:- गुरु का जीवन में उतना ही महत्व है जितना माता-पिता का । गुरु ही ईश्वर प्राप्ति का मार्ग दिखते हैं । अमरत्व की प्राप्ति गुरुकृपा के बिना संभव नहीं है । आध्यात्मिक मार्ग की पूर्ति गुरु ही करते हैं । उन्ही की कृपा से शुभता , दिव्यता और भगवदीय सामर्थ्य का उत्थान भी सहज संभव है । जब गुरु संकल्प करते है की शिष्य की आध्यात्मिक उन्नति हो , तभी सही अर्थो में शिष्य की आध्यात्मिक उन्नति होती है । जिसे गुरु कृपा कहा जाता है । बिना गुरु का जीवन महत्वहीन हो जाता है । गुरु के मार्गदर्शन बिना मनुष्य सही सोच एवं सही दिशा की ओर जाने में सफल नहीं हो सकता । हमारे यहां तो सिक्ख धर्म का आधार और लक्ष्य ही गुरु है । पुरातन काल में गुरु आश्रम या गुरुकुल में शिक्षा देने के साथ चरित्र और संस्कारो का निर्माण किया जाता ठगा । गुरुकुल से दीक्षित होकर कई चक्रवर्ती राजा , योद्धा विद्धान हुए । जिन्होंने गुरुकृपा का महत्व समझा और समझाया । अतः भारतीय संस्कृति में अनादिकाल से गुरु की महिमा बहुत ऊँची रही हैं ।

सच्चा परमार्थी शिष्य कौन है ?

उत्तर:- गुरु में जिसका द्रृढ़ विश्वास हैं , जिसका चित्र गुरुचरणों में ही अटल रहता हैं एवं गुरु चरणों में जो निश्चलता रखता हैं वही सच्चा परमार्थी शिष्य हैं । वही गुरूपदेश से एक क्षण में परमार्थ का पात्र हो जाता हैं । जिस प्रकार एक दीपक से दूसरा दीपक जलाने पर वह भी उसी की तरह हो जाता हैं ठीक उसी प्रकार निश्चल वृत्रि के साधको को गुरु प्राप्त होते ही वह तत्काल तवदुप हो जाता हैं । गुरु कृपा से शिष्य को अंतर की अनुभूति होती हैं । यह सर्वविदित हैं की सूर्य प्रकाशमय तत्व और चन्द्रमा भी प्रकाशमय हैं किन्तु, चन्द्रमा का अपना कोई प्रकाश नहीं हैं । वह तो सूर्य की प्रकाश से ही प्रकाशित होता रहता हैं । ऐसे ही गुरु सूर्य के सामान हैं और शिष्य चन्द्रमा के सामान । गुरुरूपी सूर्य के प्रकाश में तप कर जो शिष्य दुनिया को शीतलता प्रदान करने वाला ज्ञान आगे फैलता हैं ।वही सच्चा परमार्थी शिष्य हैं ।

शिष्य गुरु कृपा को प्राप्त कैसे करें?

उत्तर:- गुरु कृपा का विशेष अनुदान पाने के लिए एक मात्र रास्ता है : गुरुध्यान, गुरुभक्ति , गुरुसेवा, गुरुकार्य,एवं गुरुआज्ञा पालन । जब यह सब संकल्पित हो केर किया जाता है तो शिष्य की भक्ति, निष्ठां की शक्ति में बदल जाती है एवं पूर्णाहुति के साथ ही उसे मिलता है, गुरु का विशेष अनुदान, गुरु का विशेष आशीर्वाद जो की शिष्य के जीवन को दिव्यता में बदल देता है । इससे शिष्य का आत्मिक कायाकल्प तो हो ही जाता है साथ ही उसे भौतिक जीवन की परेशानियों से भी मुक्ति मिल जाती है एवं और भी ऐसा बहुत कुछ प्राप्त होता है जो हमारी कल्पनाओ से परे है जिसे शब्दों में वयक्त नहीं किया जा सकता उस शिष्य स्वयं ही अपने जीवन में अनुभव केर सकता है ।

वर्तमान सुक्षी में हमारी संवेदनाएं लगभग मर चुकी है, कौन सा कारण है जो ऐसा हुआ?

उत्तर:- देखिए इस सदी में यदि कुछ खोया है तो वह है कृतज्ञता। वर्तमान सदी में कृतज्ञता खो गई है। कृतज्ञता सबसे गहरी भावनाओं में से एक है। यदि आप कृतज्ञ हो तो आप स्वत: ही करुणामय आनंदमय एवं शांत हो जाते हैं। आज के युग में कोई यह स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि उसके लिए किसी ने कुछ किया है फिर कृतज्ञता भी संभव कैसे हो सकती है। संवेदनाएं लगभग मर चुकी है।
अहंकार और अज्ञान के कारण ऐसा प्रतीत होता है उन्हें की वह तो उनका अधिकार या किसी का आभार व्यक्त करने में सफलता हाथ नहीं लगती। इसके फलस्वरुप न तो प्रसन्नता मिलती है और न ही शांति और आनंद।

गणतंत्र के मूलमंत्र कौन से हैं?

उत्तर:- भारत एक ऐसा देश है जहाँ विभिन्न जाती और धर्म के लोग प्रेम से रहते हैं ।अपने देश और मातृभूमि के प्रति सम्मान रखना , स्वाभिमान प्रकट करना और उसके प्रति वफादार रहना देशभक्ति की भावना का सूचक हैं । भारतीय गणतंत्र का सूर्य हमें और हमारे परिवार एवं सम्पूर्ण राष्ट्र को आलौकित करता है । इसकी रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है । समय वयक्ति की गरिमा , विश्व बंधुत्व , सर्वधर्म -स्वाभाव , धर्म निरपेक्षता गणतंत्र के मूलतत्व हैं।

क्या देश भक्ति एक सर्वश्रेस्ट गन हैं ?

उत्तर:- हाँ ! देश भक्ति एक सर्वश्रेस्ट गुण हैं । देशभक्ति का तात्पर्य अपने देश से प्रेम करना हैं । यह मानव के हृदय में जलने वाली ईश्वरीय ज्योति हैं जो अपनी जन्मभूमि को अन्य सभी से अधिक प्रेम करने की शिक्षा देती हैं । एक संस्कृत उक्ति में कहा गया हैं की माँ और मातृभूमि तो स्वर्ग से भी महँ हैं अपने देश के दुःखों और खतरों को हमें इसके साथ खड़ा होने , इसके लिए कार्य करने और यदि आवश्यकता पडे तो इसके लिए अपना जीवन अर्पण करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए । इसी देश ने हमें अपनी गोदी में खिलाया हैं । अपनी विपलता से हमारा पोषण किया हैं- अपनी हार्दिकता से हमें सुरक्षा प्रदान की हैं ।देश भक्ति का शब्द सुनते ही शरीर रोमांच से भर जाता हैं । एक ऐसा भाव पैदा होता हैं जो शब्दों में वयक्त करना असंभव सा प्रतीत होता हैं । एक ऐसा जोश और जिम्मेदारी का भाव पैदा हो जाता हैं जो समय और उम्र की सीमा को तोड़कर सबमे एकरूपता का बोध करने लगता हैं । जाती वर्ग , संप्रदाय और धर्म की साडी सीमाएं जैसे टूट जाती हैं और प्रेम एवं बंधुत्व की निर्मल धरा बहने लगती हैं । दिल गर्व का अनुभव करता हैं, देश के लिए त्याग की भावना अपने उत्कर्ष तक पहुंच जाती हैं फिर जुवा से ये शब्द अपने आप आने लगते हैं- जो भरा नहीं हैं भावो से बहती जिसमे रसधारा नहीं , हृदय नहीं वह पत्थर हैं जिसमे स्वदेश का प्यार नहीं.. ।”

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