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Samajhdari Se Niptara – Short Story in Hindi (Part-6)


समझदारी

बात पुरानी है नया खाता खुलवाना था। स्कूटर बैंक के सामने थोड़ी दूरी पर खड़ा कर दिया । काम होने के बाद जैसे ही बाहर निकले तो देखा -स्कूटर वहां नहीं था । इधर उधर देखा पर कोई सुराग नहीं मिला।
आखिर किसी ने राय दी, “शिकायत लिखवा दीजिये ।”
हमने शिकायत लिखवा दी और पूछा- “कब तक उम्मीद है मिलने की ? ”
“घबराने की जरूरत नहीं, विश्वास रखिए… थोड़ी देर में वहीं-कहीं मिल जाएगा ।”
आखिर उनकी बात पर भरोसा करते हुए हम फिर से बैंक के आसपास ढूँढने लगे। वहां से काफी दूरी पर एक स्कूटर गिरा पड़ा दिखाई दिया । पास जाकर देखा तो वह तोड़-फोड़ करके फैंका गया स्कूटर अपना ही था। आश्चर्य हुआ कि उनकी बात सही निकली ।
अब समय था जो शिकायत लिखवाई थी उसे हटवाया जाए। इन्होंने जा कर कहा, “आप तो अंतर्यामी निकले आपने जैसे कहा था ठीक वैसे ही स्कूटर मिल गया है। कृपया शिकायत काट दीजिए।”
“काट दीजिये .. ऐसे कैसे काट दें । जब एफ. आई. आर. दर्ज करवाई है तो कोर्ट से ही मिलेगा । ”
“कोर्ट से ?”
“हां, कोर्ट से।”… शेष आप भी समझदार हैं… जैसे जी चाहे ले सकते हैं…. ।”
आखिर…समझ गए…। समझदारी से तुरंत निपटारा हुआ ।

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यह मन

गोपाष्टमी के दिन गौशाला की परिक्रमा करते हुए पूरे ग्रुप के सदस्य आगे निकल गए और मैं सबसे पीछे चल रही थी। अपने से आगे चल रही एक बहन पर जैसे ही नज़र पड़ी तो देखा – वह एक तूडी के ट्रैक्टर के पीछे खड़ी हो गई। जल्दी से उसने अपने बिखरे हुए बालों पर कंघी फेरी और होंठो पर लाली लगाई । फिर चलते- चलते उस कंघी को परस में डाल कर आगे चल रही औरतों के साथ जा मिली।
मैं उसके पीछे चल रही थी । मेरा ध्यान भजन से हट कर बार-बार उसी चित्र का चिंतन करने लगा। तभी चुपके से अंतरात्मा ने झंझोड़ते हुए कहा- औरों के दोष तो तुम्हें खूब दिखाई देते हैं कभी अपने को तो देख…..। जब उसने कंघी फेरी उसका ध्यान तो परिक्रमा की ओर था। तभी झट से अपने साथियों के साथ जा मिली और तुम्हारा ध्यान अब तक वहीं अटका हुआ है। कोई जवाब नहीं था मेरे पास।

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वह लड़की

कुंभ के मेले में लगे शिविर में स्वागत कक्ष पर मेरी ड्यूटी थी । लगभग बीस इक्कीस वर्षीय छोटे से कद की , दुबली-पतली, साधारण सी लड़की, सूती साड़ी पहने हुए मेरे सामने खड़ी थी। उसके हाथ, नाक, कान में कोई श्रृंगार की वस्तु नहीं थी। अपने पिता व चाचा के साथ आई थी। उसे देख कर मुझे लगा कि शायद इसे कोई आर्थिक सहायता की जरूरत होगी… पर जैसे ही उसे कुछ देने के लिए हाथ बढ़ाया तो कहने लगी – “नहीं नहीं.. हमें रूपये नहीं चाहिए।”
–“फिर ..?
— उसके पिता ने कहा, “हम तो बस यहां तीर्थ दर्शन करने आए थे , सो हो गए । इस बेटी का पति नहीं है…भजन ध्यान में लगी रहती है और …उसके बाद वह बोल नहीं पाया।
मैं सीट छोड़ कर खड़ी हो गई । डबडबाई उन आंखों को देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं था । उसके कंधे पर हाथ रखते हुए मैंने कहा – “सब ठीक हो जाएगा.. .तुम पुस्तकें पढ़ा करॊ। ईश्वर मंगल करेंगे ।”
“इसे पढ़ना नहीं आता।” पिता बोले।
मैं सोच में पड़ गई । अनजान शहर में इसकी कैसे क्या सहायता करूं…. फिर जिसकी कोई चाहत ही न हो उसे कोई दे भी क्या सकता है ।
तुरंत ही वह लोग चल पड़े । जब उसके पिता चार कदम आगे बढ़ गए तो वह मेरे पास आकर बोली, “तुम फिर कब मिलोगी ?”
“मैं… क्या कहती उसे…. तुम्हें 12 बर्ष बाद कुंभ मे मिलूँगी या तुम मेरे घर आना… अथवा मैं तेरे घर आऊँगी… कोई उत्तर न दे पाई मैं उसे ।” उसके शब्दों ने मुझे नि:शब्द कर दिया।

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उसकी मुश्किल

घर में बर्फ मांगने आई बाई से सरिता ने कहा, “एक बात कहूं … बुरा तो नहीं मानोगी ? ”
“जी …कहिए ।”
“तुम यह रोज़ – रोज़ बर्फ मांगने क्यों आती हो. …जानती हो ऐसे मांगना अच्छा नहीं होता… घर में जो हो – जैसा हो – वैसे की आदत डालनी चाहिए ।”
सरिता की बात सुनते ही उसकी आँखें भर आईं और रूँधे स्वर में बोली, ” क्या करूँ जी, ये छोरियां हैं न जो.. ये टिकने नहीं देतीं…. कोठियों में काम करने जाती हैं तो सब कुछ देख कर मचल उठती हैं …और तो कुछ नहीं माँगतीं , मैं समझा देती हूँ पर ठंडा पानी मांगती हैं । आप तो जानती हैं मैडम ! गर्मी बहुत है…
हर रोज़ तो बर्फ भी खरीदनी मुश्किल है जी..” आंसू छलकने लगे थे उसके…. ।

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धारणाएं

कुछ लोग जोश में आ कर कहीं भी कुछ भी बोल देते हैं । जैसे कि मैं तो भूल कर भी रेहड़ी बाजार का खाना न खाऊँ ..छी.. .. गंदे से हाथों वाले उस व्यक्ति से पानी कभी न पीऊं। इतना घटिया स्वभाव है उसका ..मैं तो उससे भूल कर भी बात न करूँ…। सब की अपनी- अपनी धारणाएं तो होती हैं पर पता तब चलता है जब किसी मजबूरी के कारण अपनी ही कही बातें झूठी हो जाती हैं। बोलते समय हम इतना भी नहीं सोचते कि हम कह क्या रहे हैं।
मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ । रसोई घर में थोड़ा सा पानी था । वह मैंने बिखेर दिया । जैसे ही घड़ा नल के नीचे किया तो पानी जा चुका था। मिस्त्री भी घर में काम कर रहे थे ।अन्य किसी भी घर से मांगना उचित नहीं लगा । सोचा – बिसलेरी ले लेंगे।
मिस्त्रियों को तो ऊपर की टंकी का पानी पिला दिया । अपने लिए.. मार्केट जाने वाला कोई नहीं था ।
जब प्यास से व्याकुल होने लगी तो चुपके से स्वयं भी टंकी का वही पानी पी लिया जिसे रोज़ मैं गंदा कहती थी।

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