bedpage.com
Think Smart Think Digital!

Women Days – Short Story in Hindi (Part-9)


मेरा तेरा आदमी

लम्बी यात्रा करने के पश्चात् वापिस स्टेशन तक आते हुए हम एक ही आटो रिक्शा में इकट्ठे सफर कर रहे थे।
एक औरत जो लगभग चालीस वर्ष की होगी वह पास बैठी सत्तर वर्षीय वृद्धा को बोल रही थी, “मैंने कहा था न कि किसी को साथ मत लेना… उस बूढ़ी औरत को साथ में ले लिया तुमने…गांव से क्यों लेकर चली थी उसे… अब देखो गुम हो गई न मेले में ?
— मुझे क्या पता था कि ऐसा होगा… कोई बात नहीं मिल जाएगी । अभी वो लोग गए हैं ढ़ूँढने के लिए साथ में ले आएंगे ।
— तुझे लगता है कि कोई बात नहीं …मेरा आदमी तो ढूंढ रहा है न.. तेरा आदमी तो साथ है। तेरा तो कुछ नहीं गया.. मेरा आदमी तो वहीं पर रह गया न… अब पता नहीं आने में कितनी देर लगेगी… ।
— “यह तुम्हारी क्या लगती है ? ”
मैंने चालीस वर्षीया औरत से पूछा ।
— “सास।”
— फिर इनका भी तो बेटा है .. यह मेरा आदमी – तेरा आदमी क्या बोल रही हो ?

_________________

बात झाड़ू की

घर में दुकान किए कुछ ही दिन हुए थे । एक दिन बरसात के पानी से आंगन गीला हो गया । मां ने जल्दी से झाड़ू उठा लिया ।
मैंने कहा – “मां ! बाहर आंगन में तुम झाड़ू नहीं लगाओगी , मुझे दो।”
— “नहीं बेटा ! देर हो जाएगी.. तुम अभी नहाए भी नहीं… कोई ग्राहक आ गया तो ? जाओ नहाओ तुम…झाड़ू मुझे लगाने दो।”
— “मैंने कहा न… तुम्हारी कमर में दर्द हो जाएगा, तुम नहीं झुकोगी.. मुझे लगाने दो ।”
” बेटा! जो झुकता है वही पाता है ।”
मां मुस्कराने लगी । “देखो! जब नौकरी होती है तो व्यक्ति बाहर अकेले काम पर जाता है। “वर्षा आओ -आंधी आओ” बंधी तनख्वाह हाथ में आ जाती है परन्तु जब कोई घर में दुकान करता है तब पूरे परिवार को लगना पड़ता है …तब कहीं जाकर कमाई पल्ले पड़ती है… समझे…. ।”
मां बाहर झाड़ू देने लगी और नहाते समय मां के शब्द मेरे कानों में गूंजने लगे थे..।

_________________

महिला दिवस

महिला दिवस पर सेक्टर-10 मैं एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। हुआ यूं पहले तो आयोजन कर्ताओं द्वारा मंच पर ही चार पुरुष और सिर्फ एक औरत बिठाई गई थी। दूसरी बात पहले पुरुषों के बोलने का नंबर लगा। उन चारों ने महिलाओं के अधिकारों पर इतने लंबे चौड़े भाषण दिए कि एक महिला को उठकर याद दिलाना पड़ा, कि सर! आप महिला दिवस पर बोल रहे हो और महिलाओ हक छीन रहे हो। समारोह समाप्ति के सिर्फ बीस मिनट बाकी बचे हैं। मंच पर हमारा बोलना तो दूर की बात आप तो बराबर बैठी महिला का भी हक छीन रहे हो… उन्हें तो बोलने का मौका दो। कृपया आप बैठिए।”
इतने में दूसरी महिला उठकर कहने लगी, ” आपके भाषणों से महिलाओं को अधिकार नहीं मिलने वाले…अभी तो महिलाओं को बोलने का अधिकार ”
आखिर बड़ी मुश्किल से थोड़ा सा समय मिला। सच्चाई यही है कि बातें होती है बड़ी- बड़ी परन्तु अधिकार मिलते नहीं, छीनने पड़ते हैं … ।

_________________

औपचारिकता

कई बार रिश्ते दूर होते हुए भी इतने नजदीक होते हैं कि बीच में दूरी नाम की कोई चीज़ नहीं होती। महीने वर्षों बीत जाएं फिर भी इतने पास होते हैं कि बात करते ही लगता है जैसे कभी बिछड़े ही नहीं थे । मुझे भी ऐसा ही लगता है। रवि को मिले हुए लगभग अठारह साल हो गए। तब हम पार्क में इकटठे बैडमिटन खेला करते। लम्बे समय बाद… भला हो इस फेसबुक का जो मुद्दतों बिछड़े हुए मेरे साथी से मिला
दिया । बस फिर लाईक कमेंट्स हो गए शुरू… ।
कुछ दिन पहले अचानक ही वह मुझसे मिलने आ गया । बातचीत के दौरान कहने लगा, “यार ! कभी – कभी तुम्हारी याद बहुत आती थी ।”
हां! तभी तो तुम बीसियों लोगों के कमेंट्स जवाब में “श्री नरेश जी, श्री महेश जी थैंक्स ” लिखते नहीं थकते थे और मेरे … मेरे नाम के साथ “न श्री न जी” लगाने का कभी कष्ट नहीं किया ।
“हा -हा … देख ! तेरे नाम के आगे पीछे कभी कुछ नहीं लगाऊंगा .. समझे… । अरे !….श्री और जी तो औपचारिकता के शब्द हैं । तुम… तुम तो मेरे अपने हो… कभी मुझसे दूर नहीं हुए । अपनों में भला औपचारिकता कैसी… ।”
(मेरे बोलने का कोई अर्थ नहीं रह गया था… ।)

_________________

वह बोली

“क्या यह बटेर की तरह मेरी ओर टुकुर – टुकुर ताक रही हो.. जाओ अपना काम करो।” पंद्रह वर्षीय छोटी-सी लड़की सीमी से जब मैंने कहा तो वह चली गई और कपड़े संभालने लगी।
थोड़ी देर बाद जब वह मक्खन लगाकर ब्रैड बना रही थी तो मैंने फिर टोका, ” यह चार ब्रैड क्यूं बना रही हो.. मान्या तो दो ही खाती है ।”
“नहीं – नहीं मैडम! आपके जाने के बाद दिन में यह चार ब्रैड खाने लगी है ।” मैं चुप रही ।
बीस मिनट बाद मैंने मान्या से पूछा तो कहने लगी कि दो मैंने खाए हैं और दो दीदी ने खाए हैं ।
मैंने सीमी से पूछा – ” मान्या ने खा लिए ।”
” हाँ- हाँ ! चारों खा लिए ।”
“झूठ बोलती हो.. सच बताओ ।”
” दो मैंने खाए हैं।” उसने नजरें झुका ली ।
“तुमने क्यूं खाए ?”
वह चुप रही ।
“बताओ तो.. चोरी क्यूं करती हो… तुम्हें तीनों समय रोटी देती हूँ..देती हूँ ना… बोलो ? ”
मुझसे नजरें मिलाकर वह बोली –
” दो – दो रोटी देती हो… सारा दिन काम करती हूं… आप कोई काम भी नहीं करती फिर भी चार – चार खाती हो ।” कहकर उसने नजरें झुका ली ।

_________________

Have any Question or Comment?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *